देश की खबरें | स्वतंत्र विश्लेषण में उत्सर्जन नियंत्रण मानदंडों में ढील को लेकर सवाल खड़े किये गये थे

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. भारत द्वारा सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) उत्सर्जन नियंत्रण मानदंडों में महत्वपूर्ण ढील देने से पहले एक स्वतंत्र विश्लेषण ने चेतावनी दी थी कि इस कदम को उचित ठहराने के लिए उद्धृत किए जा रहे प्रमुख वैज्ञानिक अध्ययन विरोधाभासों से भरे हुए हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने का जोखिम पैदा करते हैं।

नयी दिल्ली, 13 जुलाई भारत द्वारा सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) उत्सर्जन नियंत्रण मानदंडों में महत्वपूर्ण ढील देने से पहले एक स्वतंत्र विश्लेषण ने चेतावनी दी थी कि इस कदम को उचित ठहराने के लिए उद्धृत किए जा रहे प्रमुख वैज्ञानिक अध्ययन विरोधाभासों से भरे हुए हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने का जोखिम पैदा करते हैं।

मानंदडों में ढील के जरिये बड़ी संख्या में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को छूट दी गई थी।

पिछले महीने जारी एक विश्लेषण में, ऊर्जा एवं स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (सीआरईए) ने आरोप लगाया कि एनईईआरआई, एनआईएएस और आईआईटी दिल्ली जैसे संस्थानों द्वारा किए गए अध्ययनों का उपयोग देश भर के बिजली संयंत्रों द्वारा ‘‘निष्क्रियता को उचित ठहराने के लिए चुनिंदा रूप से किया जा रहा है’’, जो प्रमुख वायु प्रदूषक एसओ2 उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (एफजीडी) इकाइयों की स्थापना में देरी कर रहे हैं।

भारत ने दिसंबर 2015 में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के लिए सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन संबंधी कड़े मानक तय किए थे, जिनका दो वर्षों के भीतर अनुपालन आवश्यक था।

कई बार विस्तार के बाद भी, 92 प्रतिशत कोयला आधारित बिजली संयंत्रों ने अभी तक सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए एफजीडी इकाइयां स्थापित नहीं की हैं।

सल्फर डाइऑक्साइड एक प्रमुख वायु प्रदूषक है, जो सूक्ष्म कण पदार्थ ‘पीएम2.5’ में परिवर्तित हो जाता है और कई प्रकार की बीमारियों का कारण बनता है।

ग्यारह जुलाई की अधिसूचना में, पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के 10 किलोमीटर के भीतर या दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में स्थित कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के लिए एसओ2 अनुपालन की समय सीमा को दिसंबर 2024 से दिसंबर 2027 तक बढ़ा दिया है।

गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों में स्थित संयंत्रों का अब मामला-दर-मामला आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा, जबकि अन्यत्र संयंत्रों को पूरी तरह से छूट दी गई है, बशर्ते कि वे मानदंडों को पूरा करते हों।

मंत्रालय ने इस कदम के पीछे कई अध्ययनों के साथ-साथ तकनीकी-आर्थिक चिंताओं, कोविड-संबंधी देरी और विद्युत मंत्रालय की सिफारिश को भी कारण बताया।

‘वैज्ञानिक प्रमाणों से बहाने तक’ शीर्षक वाली सीआरईए की रिपोर्ट ने इस तर्क का खंडन किया और कहा, ‘‘इससे भी बुरी बात यह है कि एनईईआरआई, एनआईएएस और आईआईटी दिल्ली (2022 और 2024) जैसे संस्थानों द्वारा किए गए अध्ययनों का अब चुनिंदा रूप से इस निष्क्रियता को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें कम एसओ2 स्तर या मामूली सीओ2 वृद्धि का हवाला देकर यह तर्क दिया जा रहा है कि एफजीडी अनावश्यक हैं। ये तर्क बिल्कुल भी सही नहीं हैं।’’

रिपोर्ट में कहा गया कि एनईईआरआई का यह दावा कि वातावरण में एसओ2 का स्तर पहले से ही कम है, ‘‘बेहद भ्रामक’’ है।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्र (सीएएक्यूएमएस) बिजली संयंत्र प्रदूषण के वास्तविक प्रभाव को नहीं पकड़ पाते हैं, वे उन रासायनिक प्रतिक्रियाओं को भी ध्यान में नहीं रखते जो सल्फर डाइऑक्साइड को पीएम 2.5 जैसे अन्य प्रदूषकों में बदल देती हैं। सिर्फ इसलिए कि स्टेशन पर एसओ2 की रीडिंग कम है, इसका मतलब यह नहीं है कि संयंत्र प्रदूषण नहीं फैला रहा है।’’

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