देश की खबरें | नायडू के कार्यकाल की शुरुआत में राज्यसभा की उत्पादकता कम रही, बाद में हुआ सुधार

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू के कार्यकाल की शुरुआत में सदन की उत्पादकता कम रही थी, लेकिन बाद में इसमें सुधार हुआ।

नयी दिल्ली, छह अगस्त राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू के कार्यकाल की शुरुआत में सदन की उत्पादकता कम रही थी, लेकिन बाद में इसमें सुधार हुआ।

इस साल के बजट सत्र तक उन्होंने जिन 13 पूर्ण सत्रों की अध्यक्षता की, उनमें से पहले पांच सत्रों की उत्पादकता 6.8 प्रतिशत से 58.8 प्रतिशत के बीच रही, जबकि अगले आठ सत्रों में से छह में उत्पादकता 76 प्रतिशत से 105 प्रतिशत के बीच रही और पांच सत्र में निर्धारित समय का लगभग 100 प्रतिशत कामकाज हुआ।

इस अवधि के दौरान सदन में व्यवधानों और स्थगन के लिए 58 मुद्दे मुख्य रूप से जिम्मेदार थे। राज्यसभा की 57 प्रतिशत बैठकों में दिन के किसी भी भाग या पूरे दिन के लिए व्यवधान और स्थगन देखा गया।

नायडू के कार्यकाल के दौरान राज्यसभा के कामकाज पर अपनी तरह का पहला प्रकाशन सोमवार को जारी किया जाएगा, जिसमें बताया गया है कि आंध्र प्रदेश के लिए विशेष श्रेणी के दर्जे का मुद्दा चार सत्रों में 36 बैठकों में उठाया गया था।

अगले चार मुद्दे तीन कृषि कानूनों को पारित करने और किसानों के विरोध, पेगासस स्पाइवेयर, कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड के गठन और 2021 के शीतकालीन सत्र में 12 सदस्यों के निलंबन से संबंधित हैं।

नायडू के कार्यकाल के दौरान, राज्यसभा के लगभग 78 प्रतिशत सदस्य प्रतिदिन सदन में उपस्थित हुए। दैनिक उपस्थिति रजिस्टर पर उनके हस्ताक्षर से यह जानकारी सामने आई। वहीं लगभग तीन प्रतिशत सदस्यों ने ऐसा नहीं किया, 30 प्रतिशत सदस्यों ने विभिन्न सत्रों में पूर्ण उपस्थिति की सूचना दी।

पिछले पांच वर्षों के दौरान राज्यसभा के कामकाज और 1978 से सदन के कार्यात्मक विकास के बारे में इस तरह का विवरण ‘‘राज्य सभा: 2017-2022 - एक अवलोकन’’ नामक प्रकाशन में शामिल किया गया है, जो आठ अगस्त को जारी किया जाएगा।

नायडू ने निर्धारित 289 बैठकों के मुकाबले इस अवधि के दौरान 261 बैठकों के आयोजन के साथ 13 पूर्ण सत्रों की अध्यक्षता की।

वर्ष 2019 में 52 विधेयक पारित किए गए, जो 36 वर्षों में सबसे अधिक है। साल 2018 में अब तक की सबसे कम वार्षिक उत्पादकता 40 प्रतिशत और 2021 में दूसरी सबसे कम 58.8 प्रतिशत दर्ज की गई।

वर्ष 1952 से 2019 तक के 67 वर्षों के दौरान, विधायी उत्पादकता केवल छह वर्षों - 1976, 1984, 1985, 1993, 2002 और 2003 में प्रति बैठक एक से अधिक विधेयक रही है।

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