देश की खबरें | जलवायु परिवर्तन के चलते पलायन करने वालों के लिए आईआईटी मद्रास ने दिया ढांचे का सुझाव

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नयी दिल्ली, दो जून भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के अनुसंधानकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन के कारण सीमा पार पलायन की समस्या के समाधान के लिए एक नियामक ढांचे का सुझाव दिया है जिससे शरण चाहने वालों को लौटने के लिए मजबूर करने के बजाय मेजबान देशों में समाहित किया जा सकता है।

नियामक ढांचा इस बात पर प्रकाश डालता है कि प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कानून विस्थापन के लिए मजबूर लोगों के पूरे वर्ग की रक्षा के लिए नाममात्र को पर्याप्त है। संबंधित अनुसंधान सामग्री प्रतिष्ठित पत्रिका ‘वायर्स क्लाइमेट चेंज’ में भी प्रकाशित हुई है।

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि नियामक ढांचा सुनिश्चित करेगा कि शरणार्थी अपने गृह देशों में लौटने को मजबूर न हों।

उन्होंने रेखांकित किया कि संवेदनशील क्षेत्रों से शरण चाहने वालों को मेजबान देशों में उनके ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के अनुपात में अपनाया जाना चाहिए।

अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि प्रत्याशित वैश्विक पर्यावरणीय परिवर्तनों और संबंधित नुकसान की गंभीरता को देखते हुए शीघ्र एवं उचित कार्रवाई करना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि हालांकि, इस सवाल का जवाब कभी पूरी तरह नहीं दिया जा सकता कि क्या संबंधित व्यक्ति ने जलवायु परिवर्तन की वजह से पलायन किया है।

उन्होंने कहा, ‘‘हाल के वर्षों में, जलवायु परिवर्तन सहित पर्यावरणीय खतरों के बढ़ते जोखिमों ने पलायन को तेज कर दिया है। ऐसा ही एक मामला बांग्लादेश की राजधानी ढाका की घनी बस्तियों का है, जहां के निवासी जलवायु संकट के मुहाने पर हैं।’’

आईआईटी-मद्रास के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग के सुधीर चेला राजन ने कहा, ‘‘मानसून की बाढ़ और समुद्र के बढ़ते स्तर से उत्पन्न चक्रवातों के कारण तट के किनारे रहने वाले लोग बांग्लादेश की राजधानी की ओर पलायन कर रहे हैं। गंभीर रूप लेता जलवायु परिवर्तन इन निवासियों के लिए एक गंभीर वास्तविकता है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘जलवायु वैज्ञानिक एक दशक से अधिक समय से जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप कुछ सर्वाधिक गरीब देशों से लाखों लोग विस्थापित होने को मजबूर हो जाएंगे...उन्हें शरण प्रदान करने की अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नैतिक जिम्मेदारी है।"

अनुसंधान पत्र में कहा गया है कि शरण चाहने वाले सभी लोगों को शरण के योग्य समझा जाना चाहिए, भले ही वे शरणार्थी संबंधी संधि की संकीर्ण आवश्यकताओं को पूरा न करते हों तथा जो पक्ष जलवायु निर्वासितों की रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें गैर-प्रतिशोध सिद्धांत के तहत सभी पहचान योग्य शरण चाहने वालों का सम्मान करना चाहिए।

अध्ययन में कहा गया है कि आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र के अनुसार 2020 में 4.05 करोड़ लोग विस्थापित हुए और इनमें से तीन करोड़ लोग मौसम संबंधी आपदाओं के कारण विस्थापित होने को मजबूर हुए।

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