देश की खबरें | आईआईएससी के वैज्ञानिकों ने विभिन्न तरह के इस्तेमाल के लिए तरल बूंदों के आच्छादन की तकनीक विकसित की

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के वैज्ञानिकों ने एकल क्रिस्टल विकास और कोशिका संवर्धन सहित विभिन्न अनुप्रयोगों में इस्तेमाल की जाने वाली तरल बूंदों के आच्छादन की एक तकनीक विकसित की है।

बेंगलुरु, 15 दिसंबर भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के वैज्ञानिकों ने एकल क्रिस्टल विकास और कोशिका संवर्धन सहित विभिन्न अनुप्रयोगों में इस्तेमाल की जाने वाली तरल बूंदों के आच्छादन की एक तकनीक विकसित की है।

बेंगलुरु स्थित आईआईएससी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके कहा, ‘‘तेल के अनुकूल और ‘हाइड्रोफोबिक’ कणों वाले एक मिश्रित आवरण से बूंदों को ढंकने के लिए इस तकनीक के तहत कोशिकीय प्रभाव (संकरे रास्ते से तरल पदार्थ का ऊपर चढ़ना) का इस्तेमाल किया गया।’’

यह शोध रिपोर्ट ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ में प्रकाशित हुई है।

बूंदें विभिन्न क्षेत्रों के लिए अहम हैं। माइक्रोरिएक्टर में बूंदों का इस्तेमाल प्रतिक्रिया के अलग-अलग वातावरण तैयार करने में हो सकता है या विभिन्न रसायनों को मिश्रित करने में इसका उपयोग हो सकता है।

दवा आपूर्ति प्रणाली में बूंदों का इस्तेमाल दवा या अन्य पदार्थों को विशेष ऊतकों या अंगों तक पहुंचाने में किया जा सकता है। द्रवों का इस्तेमाल क्रिस्टल का विकास नियंत्रित करने में भी किया जा सकता है।

आईआईएससी में सेंटर फॉर नैनो साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीईएनएसई) के शोध छात्र और प्रमुख शोधकर्ता रुत्विक लाथिया कहते हैं, ‘‘कोशिका संवर्धन (सेल कल्चर) के क्षेत्र में बूंदों का उपयोग नियंत्रित वातावरण में कोशिकाओं को विकसित करने के लिए किया जा सकता है, जो कोशिका की व्यवहार्यता और इसके प्रसार में सुधार करने में मदद कर सकता है।’’

विज्ञप्ति में कहा गया है कि इन बूंदों का इस्तेमाल करने में कई चुनौतियां भी हैं। इसमें कहा गया है कि ये बूंदे आसानी से वातावरण के कारण प्रदूषित हो सकती हैं।

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)

Share Now

\