फुटबॉल के खुमार के लिए वर्ल्ड कप और फीफा कितने जरूरी
भले ही फुटबॉल वर्ल्ड कप की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन इसका आयोजन करने वाली संस्था फीफा की साख आज शायद सबसे निचले स्तर पर है.
भले ही फुटबॉल वर्ल्ड कप की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन इसका आयोजन करने वाली संस्था फीफा की साख आज शायद सबसे निचले स्तर पर है. सवाल उठ रहा है कि फुटबॉल को अब भी फीफा की जरूरत क्यों है?पूरी दुनिया की निगाहें इस वक्त फुटबॉल वर्ल्ड कप पर टिकी हुई हैं. कोई या तो लियोनेल मेसी के गोल करने के रिकॉर्ड को देख रहा है या केप वेर्डे के उस गोलकीपर को जो रातों-रात मशहूर हो गया, या फिर फैंस के उन वीडियो क्लिप्स को जो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहे हैं.
यह एक जाना-पहचाना और स्वाभाविक तरीका है, जिससे लोगों का ध्यान उन विवादों से हटा दिया जाता है जो टूर्नामेंट शुरू होने से पहले चर्चा में थे. मसलन, अर्जेंटीना के कई फैंस को वीजा नहीं दिया गया, ताकि वे वहां जाकर मेसी को इतिहास रचते देख सकें. केप वेर्डे के लिए वोजिन्हा के शानदार प्रदर्शन के बाद ही उनकी मां को अमेरिका में आने के लिए वीजा बॉन्ड की शर्तों से छूट मिल सकी. इसके अलावा, टीवी पर दिखने वाले वे फैंस असल में उन चुनिंदा अमीर लोगों में से हैं जो टिकटों की इतनी भारी-भरकम कीमत चुका सकते हैं.
इनफानटिनो और ट्रंप के रिश्तों से फीफा पर कम हुआ भरोसा
फीफा को लेकर बढ़ती निराशा के कई कारण हैं. पिछले साल दिसंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को फीफा के पहले ‘शांति पुरस्कार' से नवाजने के फैसले को लेकर कहा जा रहा है कि यह फीफा अध्यक्ष जियानी इनफानटिनो का एकतरफा फैसला था. यह पुरस्कार टूर्नामेंट में हिस्सा लेने वाले देश ईरान के साथ ट्रंप के युद्ध शुरू करने से ठीक पहले दिया गया था. इस कदम ने संस्था के भीतर और बाहर, दोनों जगह भरोसे को और ज्यादा कम कर दिया है.
फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी के लिए रोटेशन पॉलिसी (बारी-बारी से मौका देने का नियम) अपनाता है. इसका मतलब है कि हर कॉन्फेडरेशन को बारी-बारी से टूर्नामेंट की मेजबानी करने का मौका मिलना चाहिए. बस इसमें ओशिनिया अपवाद है, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया के एशियाई प्रतियोगिताओं में शामिल होने के बाद से ओशिनिया के पास जरूरी सुविधाएं नहीं हैं. हालांकि, 2030 वर्ल्ड कप के मैच यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में रखने की वजह से, सऊदी अरब के लिए बिना किसी चुनौती के 2034 टूर्नामेंट की मेजबानी पाने का रास्ता साफ हो गया. उसे मेजबानी का यह मौका बिना किसी चुनौती के और एशिया की बारी आने (जो 2042 में होती) से काफी पहले मिल गया.
कई जानकारों का मानना है कि इनफानटिनो अब फीफा के अध्यक्ष पद की तय 12 साल की समय-सीमा को पार करने वाले हैं और इस बार भी उनके सामने किसी चुनौती की उम्मीद नहीं है. यही वजह है कि फीफा को लेकर लोगों की नाराजगी आज अपने सबसे चरम स्तर पर है. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस बारे में कुछ किया भी जा सकता है?
फीफा अपनी ताकत कैसे बनाए रखता है?
फीफा की जिम्मेदारी दुनिया भर में फुटबॉल को आगे बढ़ाने की है, लेकिन साथ ही वह इस खेल से मोटी कमाई करने वाली व्यापारिक संस्था के रूप में भी काम करता है. शासन-प्रशासन के कई जानकारों ने इस दोहरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
वर्ल्ड कप ही फीफा की कमाई का मुख्य जरिया है. हाल ही में नए रूप में शुरू किया गया और बड़ा बनाया गया ‘क्लब वर्ल्ड कप' भी अब उसकी कमाई का एक और बड़ा स्रोत बन गया है. हालांकि, इस नए टूर्नामेंट की वजह से खिलाड़ियों और उनकी यूनियनों ने हर तरफ शिकायतें शुरू कर दी हैं. लगातार बढ़ते मैचों के शेड्यूल से तंग आकर खिलाड़ियों और प्लेयर यूनियन ने मोर्चा खोल दिया है. उनका साफ कहना है कि यह व्यस्त कैलेंडर खिलाड़ियों को बुरी तरह थका रहा है. उनसे जरूरत से ज्यादा और अनुचित उम्मीदें की जा रही हैं.
बायर्न म्यूनिख और इंग्लैंड के स्ट्राइकर हैरी केन ने पिछले साल कहा था, "अगर मैं पूरी ईमानदारी से कहूं, तो मुझे नहीं लगता कि खिलाड़ियों की बात पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है.”
अगर संरचनात्मक तौर पर देखें, तो फीफा के सभी 211 सदस्य देश छह अलग-अलग महाद्वीपीय संघों (कॉन्फेडरेशन) में बंटे हैं. इन्हें हर चार साल में होने वाले अध्यक्ष पद के चुनाव में एक-एक वोट देने का अधिकार मिलता है. इसके बदले में, इन सदस्य संघों को अलग-अलग योजनाओं और कार्यक्रमों के जरिए, कम या ज्यादा आर्थिक फायदा पहुंचाया जाता है.
फीफा के गवर्नेंस, ऑडिट और कंप्लायंस कमेटी के पूर्व चेयरमैन मिगुएल मादुरो ने डीडब्ल्यू से कहा, "व्यवसायिक पहलू ही फीफा की सत्ता का असली आधार है. फीफा के अध्यक्ष इस पैसे का इस्तेमाल अपनी ताकत बढ़ाने और अपनी कुर्सी को पक्का करने के लिए करते हैं.” मादुरो को साल 2017 में इस पद से सिर्फ इसलिए हटा दिया गया था, क्योंकि उन्होंने रूस के मामले में राजनीतिक निष्पक्षता के नियमों को सख्ती से लागू करने की कोशिश की थी.
उन्होंने कहा, "यही वह चीज है जो संरक्षण की उस व्यवस्था को बनाए रखती है जिसके जरिए फीफा के अध्यक्ष अपने वफादारों को इनाम देते हैं और हर उस इंसान को सजा देते हैं जो किसी भी बात पर उनकी आलोचना करने की हिम्मत करता है. इससे यह भी पता चलता है कि क्यों मौजूदा अध्यक्षों को कभी कोई चुनौती नहीं देता और वे अनिश्चित काल के लिए कुर्सी पर जमे रहते हैं.”
क्या राजनीति और ईयू, फीफा को बदलने के लिए मजबूर कर सकते हैं?
मादुरो की ही तरह, मानवाधिकार संगठन ‘फेयरस्क्वेयर' के निक मैक्गीहान का भी मानना है कि फीफा में कोई भी सुधार बाहर से ही करना पड़ेगा. चूंकि सदस्य देश बदलाव लाने के लिए न तो प्रेरित हैं और न ही ऐसा करने में सक्षम हैं, इसलिए वे यूरोपीय संघ से इस लड़ाई को आगे बढ़ाने की अपील कर रहे हैं.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "इसके लिए राजनीतिक दखल की जरूरत है. फीफा को सुधारने का कोई और तरीका नहीं है. मुझे लगता है कि इसका स्पष्ट उदाहरण यूरोपीय संघ हो सकता है, जो खेल को उसी तरह नियम और कानून के दायरे में ला सकता है जैसे वह बड़ी टेक कंपनियों के मामले में करता है.”
मानवाधिकार संगठन ‘फेयरस्क्वेयर' ने ट्रंप और इनफानटिनो के बीच हुए लेन-देन और उनके रिश्तों को लेकर फीफा एथिक्स कमेटी के इन्वेस्टिगेटरी चैंबर में शिकायत दर्ज कराई है. वहीं दूसरी तरफ, फुटबॉल फैंस के संगठन ‘फुटबॉल सपोर्टर्स यूरोप' (एफएसई) और एडवोकेसी ग्रुप ‘यूरोकंज्यूमर्स' ने भी वर्ल्ड कप शुरू होने के ठीक पहले, टिकटों की आसमान छूती कीमतों के खिलाफ यूरोपीय आयोग में शिकायत दर्ज कराई है.
इस पूरे मामले पर यूरोपीय आयोग के एक प्रवक्ता ने कुछ भी कहने से मना कर दिया कि क्या यूरोपीय संघ वाकई फीफा के खिलाफ कोई सख्त कदम उठा सकता है. उन्होंने डीडब्ल्यू से सिर्फ इतना कहा कि एफएसई और यूरोकंज्यूमर्स की शिकायत पर ‘हमारे तय नियमों और सामान्य प्रक्रियाओं के मुताबिक' काम किया जा रहा है.
जब प्रवक्ता से पूछा गया कि क्या वे वर्ल्ड कप टिकटों की इन संदिग्ध धांधलियों में दखल देंगे, तो उन्होंने साफ किया कि यूरोपीय संघ के कानून ‘इवेंट टिकटों जैसी चीजों और सेवाओं की कीमतों को तय या कंट्रोल नहीं करते.' लेकिन उन्होंने यह भी कहा, "व्यापारियों (टिकट बेचने वालों) के लिए यह जरूरी है कि वे ग्राहकों को टिकट की पूरी कीमत की सही जानकारी दें. साथ ही, वे लोगों को धोखा देने वाले तरीकों से बचें, जैसे कि शुरुआत में कम दाम दिखाकर ऐसे टिकटों का प्रचार करना जो असल में हैं ही नहीं, या जब ग्राहक ऑनलाइन लाइन (वर्चुअल क्यू) में इंतजार कर रहे हों, तो उन पर जल्दी खरीदने का अनुचित दबाव बनाना.”
हालांकि, इस दिशा में अब तक कोई निर्णायक राजनीतिक कदम नहीं उठाया गया है. इसके बावजूद, निक मैक्गीहान को अभी भी उम्मीद की किरण नजर आ रही है.
उन्होंने कहा, "आगे चलकर कहीं न कहीं कोई ऐसा नेता जरूर सामने आएगा, जो इन ताकतवर संस्थाओं से टक्कर लेने और उन्हें जवाबदेह बनाने के राजनीतिक फायदे को समझेगा. मुझे यह एक बहुत ही रोमांचक संभावना लगती है, क्योंकि मुझे लगता है कि मौजूदा हालातों को देखते हुए अब ऐसा होना तय है.”
क्या यूएफा और फीफा के बीच तनाव की वजह से कोई अलग गुट बन सकता है?
भले ही यूरोपीय फुटबॉल संघ (यूएफा) फीफा के नीचे काम करता है, लेकिन फीफा और इस ताकतवर यूरोपियन फेडरेशन के बीच अंदर ही अंदर गंभीर तनाव चल रहा है. यह तनातनी तब खुलकर सामने आ गई, जब यूएफा ने सोमालिया के रेफरी ओमार अर्टान को सुपर कप फाइनल की कमान सौंप दी. ध्यान देने वाली बात यह है कि यह फैसला अर्टान को वर्ल्ड कप में रेफरी बनने के लिए अमेरिका में एंट्री न मिलने के ठीक कुछ दिनों बाद आया.
यूएफा के प्रेसिडेंट अलेक्जेंडर सेफरिन ने कहा, "फुटबॉल लोगों को जोड़ने के लिए बना है.”
पिछले साल, यूएफा के प्रतिनिधि फीफा कांग्रेस की बैठक को बीच में ही छोड़कर बाहर निकल गए थे. उन्होंने इनफानटिनो पर आरोप लगाया था कि वह खेल से ज्यादा अपने ‘निजी राजनीतिक हितों' को बढ़ावा दे रहे हैं. यह गुस्सा तब भड़का था जब इनफानटिनो, डॉनल्ड ट्रंप के साथ मध्य पूर्व के एक कूटनीतिक दौरे से लौटने के कारण फीफा की इस बेहद जरूरी मीटिंग में काफी देर से पहुंचे थे.
यूके में लिवरपूल यूनिवर्सिटी में स्पोर्ट्स बिजनेस के प्रोफेसर ज्योफ वॉल्टर्स ने डीडब्ल्यू से कहा, "यूएफा और फीफा के बीच साफ तौर पर तनाव बना हुआ है. यूएफा एक बहुत बड़ा कॉन्फेडरेशन है. दुनिया के कुछ सबसे बड़े और फुटबॉल को लेकर इतिहास रचने वाले देशों पर उसका गहरा प्रभाव है. इसलिए अगर कभी फुटबॉल में अलग होकर नया संगठन बनाने की कोशिश हुई, तो उसकी शुरुआत यूएफा या उसके कुछ सदस्य देशों की ओर से हो सकती है.”
वह आगे कहते हैं, "लेकिन फुटबॉल की राजनीति में खुलकर अपनी बात कहना आसान नहीं होता, क्योंकि आपको दबा दिया जाता है. अगर आप किसी चीज के खिलाफ कुछ बोलते भी हैं, तो उसका अंजाम क्या होगा? क्या इससे आपके देश को बड़े टूर्नामेंट्स की मेजबानी मिलने के मौके खत्म हो जाएंगे, जो आपके लिए बहुत फायदेमंद हो सकते हैं? क्या इसका मतलब यह होगा कि आपको अंतरराष्ट्रीय खेल जगत से पूरी तरह अलग-थलग कर दिया जाएगा?”
जर्मनी इसका एक जीता-जागता उदाहरण है. साल 2022 में कतर में अपने पहले मैच में जब जर्मनी के खिलाड़ियों ने विरोध जताने के लिए अपने मुंह पर हाथ रखा था, उसके बाद से टीम और उनके फुटबॉल संघ ने राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर बोलने से दूरी बना ली है. ऐसा शायद उन्होंने भविष्य में साल 2034 या 2038 के वर्ल्ड कप की मेजबानी की दावेदारी को ध्यान में रखकर किया हो.
खुद यूएफा को भी साल 2021 में बड़े और अमीर क्लबों द्वारा बनाई जा रही एक अलग ‘सुपर लीग' के खतरे और उसके बाद पैदा हुए कानूनी पचड़ों का सामना करना पड़ा था. मादुरो ने कहा कि यह संगठन भी ‘ठीक उसी तरह की प्रशासनिक कमियों और कमजोरियों से जूझ रहा है जैसी फीफा में हैं. हालांकि, यूएफा में यह सब उतने खुलेआम और कड़े रूप में नहीं दिखता.
अगर कोई समूह फीफा से अलग होता है, तो बाकी दुनिया के लिए इसका क्या मतलब होगा?
दुनिया के बाकी फुटबॉल महासंघों के बीच यूएफा की साख शायद सेफरिन के उस हालिया बयान से भी कमजोर हुई है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि बड़े स्वरूप (48 टीमों) वाले वर्ल्ड कप के कई मैच ‘पूरी तरह से उबाऊ और नीरस' हो जाते हैं. सेफरिन के गृह देश स्लोवेनिया के एक ऑनलाइन अखबार ‘जुर्नल24' में छपे इस बयान के बाद, अफ्रीका और एशिया के 13 फुटबॉल संघों के एक गठबंधन ने इसे एक सुर में ‘पूरी तरह से खारिज' कर दिया है.
यूरोप और दक्षिण अमेरिका, खासकर ब्राजील और अर्जेंटीना का जो रसूख दिखता है, वह असल में फीफा अध्यक्ष इनफानटिनो के एशिया और अफ्रीका वाले मजबूत गढ़ के सामने उतना मजबूत नहीं है जितना वह प्रतीत होता है. वॉल्टर्स बताते हैं कि यही एक और बड़ी वजह है जिसके कारण फीफा से अलग होकर कोई नई बगावत या नया महासंघ बनाना फिलहाल बहुत मुश्किल लगता है.
अगर इस बगावत की अगुआई दुनिया के बड़े और ताकतवर देश करते हैं, तो दुनिया भर के छोटे देशों का क्या होगा? उनके अपने देशों में फुटबॉल को बढ़ावा देने की क्षमता पर इसका क्या असर पड़ेगा?
इसके जवाब में वॉल्टर्स कहते हैं, "ग्लोबल स्पोर्ट्स में आज हम जो चुनौती देख रहे हैं, यह उसी का एक हिस्सा है. यह सिर्फ वर्ल्ड कप तक सीमित नहीं है, बल्कि कई अलग-अलग खेल लीगों में भी ऐसा ही हो रहा है, जहां बड़ी टीमें अब आगे बढ़कर खुद को अलग करने की कोशिश कर रही हैं. वे खेल से होने वाली कुल कमाई, कमर्शियल इनकम और रेवेन्यू का सबसे बड़ा हिस्सा सिर्फ अपने पास ही रखना चाहती हैं.”
क्या फीफा उन जगहों तक पहुंच रहा है जहां दूसरे नहीं पहुंच पाते?
भले ही कई अन्य लोगों ने फीफा के इन व्यावसायिक इरादों और पैसों की भूख पर गंभीर सवाल उठाए हैं, लेकिन इनफानटिनो लगातार इसी बात पर अड़े हुए हैं कि वह जो कुछ भी कर रहे हैं, वह सब फुटबॉल की भलाई और उसके हित के लिए ही है.
टूर्नामेंट की पूर्व संध्या पर, 10 जून को पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, "हम जो भी एक-एक डॉलर कमाते हैं, वह वापस फुटबॉल के खेल में ही लगा दिया जाता है. अगर हम भी बाकी लोगों की तरह अपने टीवी राइट्स ‘पे-टीवी' (पैसे देकर देखे जाने वाले चैनलों) को बेचते, तो हम चार गुना ज्यादा कमाई कर सकते थे. और रही बात टिकटों की, तो हम चाहें तो सारे टिकट मुफ्त में बांट सकते हैं, लेकिन तब भी वे आखिरकार ब्लैक मार्केट में ही बिकेंगे.”
उन्होंने आगे कहा, "फीफा अध्यक्ष होने के नाते हमें संतुलन बनाकर चलना पड़ता है. हम उन देशों में पैसा लगाते हैं जहां कोई और निवेश करने की सोचता तक नहीं, जैसे कि दक्षिण सूडान और भूटान. हमारे अलावा कोई भी यह काम नहीं कर रहा है.”
फिलहाल के लिए तो यह बात बिल्कुल सच भी है. अगर फुटबॉल की दुनिया के हिसाब से देखें, तो किसी भी दूसरी संस्था के पास न तो ऐसा अधिकार है और न ही इतना पैसा. जिस तरह फीफा इस खेल पर पूरी तरह हावी है, उसे देखते हुए इससे अलग होकर किसी नई बगावत या महासंघ के बनने की उम्मीद बहुत ही कम लगती है.
भले ही फीफा के खिलाफ लोगों की नाराजगी अपने चरम पर है, लेकिन जब तक कोई बड़ा महासंघ, देशों का गठबंधन या कोई ताकतवर इंसान आगे बढ़कर इस मुश्किल चुनौती का सामना नहीं करता, तब तक सुधार होने की गुंजाइश नाममात्र के बराबर ही है.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 04, 2026 02:30 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

