नयी दिल्ली, 17 जुलाई हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने दो जिला एवं सत्र न्यायाधीशों की अर्जी के जवाब में उच्चतम न्यायालय में एक “सीलबंद लिफाफे” में रिपोर्ट प्रस्तुत की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उच्च न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद के लिये उनकी योग्यता और वरिष्ठता पर विचार नहीं किया गया।
यह अर्जी वरिष्ठतम जिला एवं सत्र न्यायाधीश चिराग भानु सिंह और अरविंद मल्होत्रा द्वारा दायर की गई थी।
सूत्रों के अनुसार, उच्च न्यायालय के महापंजीयक ने कहा है कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने पिछले साल 11 दिसंबर को भारत के प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ को पत्र लिखकर मार्गदर्शन मांगा था कि क्या शीर्ष अदालत के कॉलेजियम को सिंह और मल्होत्रा को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने की उपयुक्तता के बारे में किसी और जानकारी की आवश्यकता है।
सूत्रों के अनुसार, रिपोर्ट में कहा गया है कि उच्च न्यायालय को इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम का नोट छह महीने बाद भी नहीं मिला।
सिंह और मल्होत्रा की याचिका पर सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हुई।
शीर्ष अदालत की पीठ ने सोमवार के अपने आदेश में कहा, “हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के महापंजीयक द्वारा सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है। उक्त रिपोर्ट की एक प्रति आज ही याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हो रहे वरिष्ठ वकील अरविंद पी. दातार की सहायता करने वाली वकील बीना माधवन को उपलब्ध कराई जाए।”
इससे पहले मई में न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की पीठ ने न्यायाधीशों की याचिका पर उच्च न्यायालय के महापंजीयक से जवाब मांगा था।
अपनी याचिका में सिंह और मल्होत्रा ने आरोप लगाया है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद के लिए नामों के चयन में उच्च न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा उनकी योग्यता और वरिष्ठता पर विचार नहीं किया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए दातार ने कहा था कि उनसे कनिष्ठ न्यायिक अधिकारियों को सेवाकालीन कोटे के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद के लिए अनुशंसित किया गया था।
याचिका दायर करने के समय सिंह और मल्होत्रा क्रमशः हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर और सोलन में जिला और सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्यरत थे।
उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम के चार जनवरी के प्रस्ताव और उसके बाद हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को विधि मंत्रालय के पत्र का हवाला देते हुए वरिष्ठ वकील दातार ने कहा था कि इनके अनुसार याचिकाकर्ता न्यायिक अधिकारियों के नामों पर उच्च न्यायालय के कॉलेजियम को विचार करना चाहिए था।
दातार ने कहा था, “याचिकाकर्ता राज्य के सबसे वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी हैं और उनका रिकॉर्ड बेदाग है।”
याचिका में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में पदोन्नति के लिए न्यायिक अधिकारियों की उच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाया गया था और कहा गया कि सिंह और मल्होत्रा की योग्यता और वरिष्ठता को नजरअंदाज कर दिया गया था, जबकि इस मुद्दे का उल्लेख उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम के प्रस्ताव में विशेष रूप से किया गया था।
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