देश की खबरें | उच्च न्यायालय ने एनएलएसआईयू में कर्नाटक के छात्रों को 25 प्रतिशत आरक्षण के खिलाफ याचिका अस्वीकार की

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नयी दिल्ली, तीन जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने बेंगलुरु स्थित ‘नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी’ (एनएलएसआईयू) में कर्नाटक के स्थायी निवासियों को 25 प्रतिशत आरक्षण देने संबंधी राज्य सरकार के फैसले की संवैधानिक वैधता को चुनौती वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है।

न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने शुक्रवार को कहा कि इस बारे में सक्षम अधिकार क्षेत्र वाली अदालत कर्नाटक में है क्योंकि उस राज्य के कानून ने वहां के स्थायी निवासियों के लिये 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया है।

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याचिककर्ता ने अपनी याचिका वापस ली और पीठ ने उसे राहत के लिये उपयुक्त मंच का रुख करने की स्वतंत्रता प्रदान की है।

पीठ ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह इस विषय पर विचार नहीं करने जा रही है और इसे खारिज करेगी क्योंकि सक्षम अधिकार क्षेत्र वाली अदालत कर्नाटक में है।

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पीठ ने कहा, ‘‘आप दिल्ली में क्या कर रहे हैं। यहां कुछ नहीं होगा।’’

याचिकाकर्ता के वकील को यह कहा गया कि यदि वह दिल से अपने मुवक्किल का भला चाहते हैं, तो उन्हें इस याचिका पर विचार करने का आग्रह करने के बजाय फौरन ही उपयुक्त मंच का रुख करना चाहिए।

इसके बाद, वकील ने याचिका वापस लेने का फैसला किया, जिसमें नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया (संशोधन) अधिनियम,2020 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

कर्नाटक विधानसभा ने इस साल मार्च में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया (संशोधन) अधिनियम,2020 को पारित कर दिया था और इसे मई में राज्यपाल की मंजूरी भी मिल गई।

यह संशोधन अधिनियम इस संस्थान में कर्नाटक के छात्रों को 25 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का प्रावधान करता है।

संशोधन के मुताबिक ‘कर्नाटक के छात्रों’ का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जिसने (इस संस्थान में दाखिले के लिये) अर्हता प्राप्त करने वाली परीक्षा से पहले राज्य के किसी मान्यताप्राप्त शैक्षणिक संस्थान में 10 साल से कम की पढ़ाई नहीं की हो।

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