देश की खबरें | यूसीसी पर समिति गठित करने का गुजरात सरकार का फैसला ध्यान भटकाने वाला कदम : विपक्ष
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गांधीनगर, चार फरवरी गुजरात में विपक्ष ने मंगलवार को कहा कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के मुद्दे पर समिति गठित करने का राज्य की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार का फैसला लोगों का ध्यान भटकाने का प्रयास है और दावा किया कि यदि संहिता लागू की गई तो आदिवासी समुदायों के अधिकार प्रभावित होंगे।
गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने दिन में बताया कि उच्चतम न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना देसाई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति को राज्य में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता का आकलन करने और विधेयक का मसौदा तैयार करने का काम सौंपा गया है।
गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता अमित चावडा ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी “अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की राजनीति” में अधिक रुचि रखती है।
कांग्रेस नेता चावडा ने कहा, ‘‘गुजरात में आदिवासियों की आबादी 14 प्रतिशत है। समान नागरिक संहिता आदिवासी समुदायों की संस्कृति, रीति-रिवाजों, धार्मिक संस्कारों और विवाह प्रणाली को प्रभावित करेगी। इसी तरह गुजरात का जैन समुदाय और देवीपूजक भी प्रभावित होंगे।’’
चावडा ने कहा कि संविधान ने भी कुछ समुदायों को अपने रीति-रिवाजों और संस्कृति को आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता दी है।
उन्होंने दावा किया, ‘‘समान नागरिक संहिता का क्रियान्वयन केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, राज्य सरकार के नहीं। लेकिन चूंकि गुजरात में भाजपा में अंदरूनी लड़ाई है और सरकार हर तरह से विफल रही है, इसलिए यह घोषणा स्थानीय निकाय चुनावों से पहले लोगों का ध्यान भटकाने की एक कोशिश है।’’
आम आदमी पार्टी के प्रदेश प्रमुख इसुदान गढ़वी ने कहा कि जब भी चुनाव होते हैं, भाजपा समान नागरिक संहिता का मुद्दा उठाती है।
उन्होंने कहा, ‘‘आज भी मालधारी समुदाय में 80 प्रतिशत घरेलू विवाद उसके अपने नेताओं द्वारा सुलझाए जाते हैं। आदिवासी समाज में बहुविवाह प्रथा है और समान नागरिक संहिता लागू होने पर ये सभी प्रथाएं समाप्त हो जाएंगी। इसलिए हमारा मानना है कि समान नागरिक संहिता ईसाइयों, सिखों, मुसलमानों और अन्य लोगों के लिए बाधा बनने जा रही है।’’
उन्होंने दावा किया कि अगर गुजरात में समान नागरिक संहिता लागू की जाती है, तो भाजपा एक भी आदिवासी सीट नहीं जीत पाएगी।
गढ़वी ने कहा, ‘‘मैं भाजपा से यह भी कहना चाहूंगा कि हर चीज को हिंदू-मुस्लिम या वोट बैंक की राजनीति के नजरिए से देखना सही नहीं है।’’
उन्होंने दावा किया कि यह मुद्दा सिर्फ इसलिए उठाया गया है क्योंकि स्थानीय निकाय चुनाव नजदीक हैं और विधानसभा चुनाव से पहले इसे फिर से उठाया जा सकता है।
उन्होंने कहा, ‘‘भाजपा ने महंगाई या बेरोजगारी के बारे में कुछ नहीं किया है, वह रोजगार सृजन नहीं करती है।’’
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के नेता दानिश सिद्दीकी ने दावा किया कि यूसीसी का इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है और उन्हें सरकार द्वारा गठित समिति से ज्यादा उम्मीद नहीं है कि वह बिना किसी पक्षपात के अलग-अलग विचारों पर गौर करेगी।
उन्होंने कहा कि अगर आदिवासियों को प्रस्तावित कानून से बाहर रखा जाता है तो यह समान संहिता नहीं होगी।
सिद्दीकी ने कहा, ‘‘हम समिति के सामने अपना पक्ष रखेंगे। जब भाजपा बहुविवाह को लेकर मुसलमानों को निशाना बनाती है तो उसे पता होना चाहिए कि यह अन्य समुदायों में भी प्रचलित है। जब एक समुदाय को (बहुविवाह की) अनुमति है और अन्य को नहीं, तो यह यूसीसी नहीं है।’’
समिति की एक सदस्य एवं सामाजिक कार्यकर्ता गीता श्रॉफ ने कहा कि उनका ‘‘दृढ़ विश्वास’’ है कि एक समान कानून से कई लाभ होंगे। उन्होंने कहा, ‘‘पिछले 30 वर्षों में मैंने महिलाओं और बच्चों को न्याय की लड़ाई में आने वाली कठिनाइयों को देखा है। उनका समाधान करने में यूसीसी से मदद मिलेगी।’’
समिति के एक अन्य सदस्य एवं वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति दक्षेश ठाकर ने कहा कि महिलाएं व्यक्तिगत कानूनों के कारण विशेष रूप से प्रभावित होती हैं और शाह बानो मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया था कि इन कानूनों में विरोधाभासों को दूर किया जाए और एक समान कानून बनाया जाए। उन्होंने कहा, ‘‘यहां तक कि संविधान सभा ने भी मार्गदर्शक सिद्धांत (राज्य नीति के) बनाए हैं, जिनमें यूसीसी का प्रावधान है। हम जानते हैं कि उत्तराखंड ने यूसीसी को लागू किया है।’’
गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने कहा कि अगर यूसीसी को लागू किया जाता है तो आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा होगी। संघवी ने कहा, ‘‘उत्तराखंड द्वारा लागू की गई समान नागरिक संहिता देश के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करती है, क्योंकि यह आदिवासियों के रीति-रिवाजों और परंपराओं की रक्षा करती है। (केंद्रीय) गृह मंत्री अमित शाह ने भी झारखंड में स्पष्ट किया है कि समान नागरिक संहिता आदिवासियों द्वारा अपनाई जाने वाली परंपराओं की रक्षा करेगी।’’
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