सरकार ने किया सोनम वांगचुक को रिहा
लद्दाख के मशहूर कार्यकर्ता और वैज्ञानिक सोनम वांगचुक को जेल से रिहा कर दिया गया है.
लद्दाख के मशहूर कार्यकर्ता और वैज्ञानिक सोनम वांगचुक को जेल से रिहा कर दिया गया है. लेकिन सरकार ने यह फैसला क्यों लिया और लद्दाख की क्या मांगें हैं?मशहूर पर्यावरण कार्यकर्ता और वैज्ञानिक सोनम वांगचुक को सरकार ने रिहा करने का फैसला किया है. पिछले कुछ समय से वह जेल में बंद थे और उन पर 'राष्ट्रीय सुरक्षा कानून' (नेशनल सिक्योरिटी एक्ट), 1980 यानी एनएसए की धाराएं लगी थीं.
सरकार ने क्यों लिया रिहाई का फैसला?
गृह मंत्रालय ने शनिवार को सोनम वांगचुक की हिरासत खत्म करने का आदेश दिया. सरकार का कहना है कि अब लद्दाख में बातचीत का माहौल बनाने की जरूरत है. शनिवार को जारी हुई एक प्रेस रिलीज में मंत्रालय ने कहा, "लद्दाख में लगातार हो रहे बंद और प्रदर्शनों की वजह से वहां के शांत समाज पर बुरा असर पड़ रहा है. इससे छात्रों, नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं, व्यापारियों और सैलानियों को काफी परेशानी हो रही है."
सरकार ने मानना कि लद्दाख की अर्थव्यवस्था और वहां का आम जनजीवन इस तनाव की वजह से थम सा गया है. सरकार ने अपने बयान में साफ किया, "हम लद्दाख में शांति और आपसी भरोसे का माहौल बनाना चाहते हैं ताकि सभी पक्षों के साथ एक सार्थक बातचीत शुरू हो सके." वांगचुक ने अपनी हिरासत का आधा समय काट लिया था, जिसके बाद सरकार ने उन्हें छोड़ने का फैसला लिया. एनएसए के तहत आरोपी को 12 महीने ही जेल में रखा जा सकता है. वांगचुक ने 6 महीने पूरे कर लिए थे.
वांगचुक पर क्या आरोप थे?
सुप्रीम कोर्ट में उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई चल रही थी. सरकार ने अदालत में दलील दी थी कि वांगचुक संवेदनशील बॉर्डर के इलाके में आम लोगों को भड़का रहे थे. सरकारी वकीलों ने ‘जेन जी प्रदर्शन' का हवाला देते हुए कहा था कि वांगचुक युवाओं को नेपाल और बांग्लादेश जैसे प्रदर्शनों के लिए उकसा रहे थे.
दूसरी तरफ, वांगचुक के समर्थकों और उनके वकीलों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया. वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि पुलिस ने वांगचुक के बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है. उन्होंने दलील दी कि वांगचुक ने हमेशा शांति की बात की है.
लद्दाख के लोगों की क्या मांगें हैं?
लद्दाख में प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि उसे राज्य का दर्जा दिया जाए. उनकी मांग है कि लद्दाख को पूर्ण राज्य बनाया जाए ताकि वहां के लोगों की अपनी चुनी हुई सरकार हो. दूसरी मांग है उनके राज्य को छठी अनुसूची में शामिल करना. भारतीय संविधान की छठी अनुसूची एक विशेष प्रावधान है, जिसे मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी क्षेत्रों की रक्षा के लिए बनाया गया था. सरल भाषा में कहें तो यह आदिवासियों को अपनी जमीन, संस्कृति और परंपराओं को बचाने के लिए 'स्वशासन' का अधिकार देती है. अब लद्दाखी चाहते हैं कि इस सूची में उन्हें ची शामिल किया जाए, जिससे वहां की जमीन और संसाधनों पर स्थानीय लोगों का नियंत्रण रहे.
तीसरी बड़ी मांग है स्थानीय नौजवानों के लिए नौकरियों में आरक्षण, और आखिरी मांग है कि लेह और कारगिल दोनों जिलों के लिए अलग-अलग लोकसभा सीटें हों.
लद्दाख के दो बड़े संगठन लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस इन मांगों को लेकर एक साथ खड़े हैं. यह पहली बार है जब लेह के बौद्ध और कारगिल के मुस्लिम समुदाय एक ही आवाज में अपने हक की मांग कर रहे हैं.
‘वांगचुक की रिहाई काफी नहीं'
सरकार अब कह रही है कि वह बातचीत के लिए तैयार है. इसके लिए एक 'हाई पावर कमेटी' भी बनाई गई है. लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि सिर्फ वांगचुक की रिहाई काफी नहीं है. उन्होंने मांग की है कि प्रदर्शनों के दौरान मारे गए लोगों के परिवारों को मुआवजा दिया जाए और जेल में बंद अन्य युवाओं को भी छोड़ा जाए.