जर्मनी: सैन्य तैयारियों पर खूब खर्चा, मानवीय मदद पर कैंची

एक तरफ जर्मनी अपने रक्षा खर्च में बड़ी वृद्धि कर रहा है तो दूसरी तरफ विकास और मानवीय सहायता के खर्च में लगातार भारी कटौती.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

एक तरफ जर्मनी अपने रक्षा खर्च में बड़ी वृद्धि कर रहा है तो दूसरी तरफ विकास और मानवीय सहायता के खर्च में लगातार भारी कटौती. और ऐसी कटौती अकेले जर्मनी नहीं कर रहा है.2025 के प्रस्तावित जर्मन बजट में कटौतियों की भरमार है. जर्मनी के आर्थिक सहयोग और विकास मंत्रालय (बीएमजेड) के लिए 10.3 अरब यूरो की रकम तय की गई है. यह धनराशि 2024 के मुकाबले एक अरब यूरो कम है. यह लगातार दूसरा साल है जब लगातार इस बजट पर कैंची चलाई गई है.

2022 के बजट से तुलना करने पर तो यह अंतर बड़े गोते जैसा लगता है. 2022 में जर्मनी विकास संबंधी आर्थिक सहायता पर 13.8 अरब यूरो खर्च कर रहा था.

मिषाएल हेर्ब्स्ट, कई सहायता संगठनों के संघ, वेनरो के प्रमुख हैं. वेनरो, जर्मनी के 140 विकास संबंधी कामों में जुटे एनजीओ का प्रतिनिधित्व करता है. वैश्विक मंच पर बढ़ते विवादों के बीच इस कटौती की इंसानी कीमत क्या हो सकती है, हेर्ब्स्ट यह बताते हैं, "10 करोड़ से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं. बिल्कुल इसी समय ज्यादा से ज्यादा दानदाता देश पीछे हट रहे हैं."

हेर्ब्स्ट मानते हैं कि ऐसे माहौल में जर्मनी को विकास सहयोग और मानवीय मदद के लिए स्थिर फंडिंग तय करने की जरूरत है. लेकिन हकीकत में इसका उलट हो रहा है. जर्मनी ऐसे वक्त में कटौती कर रहा है जब, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में विकास सहायता में भारी कैंची चलाई है. रिपोर्टें हैं कि अमेरिका, ऐसी फंडिंग में करीब 80 फीसदी कमी कर चुका है.

अमेरिका और नाटो देशों में एक सी बयार

25 जून 2025 को हुए नाटो शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने अपनी जीडीपी की पांच फीसदी रकम, हर साल रक्षा में खर्च करने पर सहमति जताई. इसके नतीजे साफ हैं, खास तौर पर मानवीय सहायता के नजरिए से.

अमेरिका, यूएन के रिलीफ फंड से पूरी तरह बाहर निकल चुका है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही अन्य कटौतियों को भी अगर इसमें मिला दें तो स्थिति और नाजुक दिखती है. इमरजेंसी ऐड कोऑर्डिनेटर टॉम फ्लेचर के मुताबिक, वह खुद दुनिया के कुछ सबसे गरीब इलाकों में चल रहे अभियानों को बंद करने पर मजबूर हुए हैं.

फ्लेचर ने कुछ हफ्ते ही पहले ही चेतावनी दी कि जरूरतमंद और भूख से पीड़ित लोगों पर इसका असर विनाशकारी होगा. अब फ्लेचर कहते हैं कि भोजन, पानी, दवा, आश्रय और अन्य आवश्यकीय जरूरतों के लिए केवल 29 अरब डॉलर ही उपलब्ध होंगे. पहले यह फंडिंग करीब 44 अरब डॉलर थी. फ्लेचर ने कहा कि कम की गई धनराशि से 11.4 करोड़ों लोगों तक ही पहुंचा जा सकेगा, पहले यह दायरा करीब 18 करोड़ लोगों तक था.

जर्मनी की मानवीय सहायता राशि में ही 53 फीसदी यानी करीब एक अरब यूरो की कटौती हुई है. वेनरो प्रमुख हेर्ब्स्ट को लगता है कि यह कदम दूरदर्शी नहीं है, "दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते, जर्मनी को यहां जिम्मेदारी लेनी चाहिए और यह ली भी जा सकती है. वह इन क्षेत्रों में लगातार बजट कटौती जारी नहीं रख सकता." इन तर्कों के बावजूद इस कटौती को रोकने की कोशिशें सफल नहीं हुई.

एक निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था होने के नाते जर्मनी मजबूत अंतरराष्ट्रीय संधियों और वैश्विक स्थिरता पर बहुत ज्यादा निर्भर है. हेर्ब्स्ट कहते हैं, "जर्मन अर्थव्यवस्था को एक मजबूत प्रतिष्ठा और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भरोसेमंद संबंधों से फायदा मिलता है. इससे जर्मनी में भी नौकरियां सुरक्षित रखने में मदद मिलती है."

क्या जर्मनी अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है?

वेल्टहुंगरहिल्फे और टेरे देस होमेस जैसे एनजीओ सरकार से निराश हैं. हालांकि जर्मन सरकार के गठबंधन समझौता में विकास और मानवीय सहायता में ऐसी कटौतियों को "उचित" बताया गया है.

इसके जवाब में राहत संगठन कहते हैं, "यह सरकार के अपने ही टिकाऊ मानवीय सहायता की पुष्टि के लक्ष्य का विरोधाभास है- वो भी खासतौर पर ऐसे समय में जब अन्य दाता देश भी पीछे हट रहे हैं."

इन घटनाक्रमों के बीच विकास मंत्री और एसपीडी पार्टी की नेता रीम अलाबाली रादोवान ने दावा किया है कि जर्मनी, अपनी वैश्विक जिम्मेदारियां निभाने के लिए वचनबद्ध है- वो भी विकास संबंधी खर्च पर कटौती पर हुए गठबंधन समझौते के बावजूद.

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