देश की खबरें | 235 करोड़ रुपये की गांधी आश्रम विकास परियोजना को मंजूरी; घर ढहाये जा रहे

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. अहमदाबाद नगर निगम (एएमसी) की स्थायी समिति ने गांधी आश्रम परिसर विकास परियोजना के लिए 235 करोड़ रुपये के विभिन्न कार्यों को मंजूरी दी है। एक अधिकारी ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।

अहमदाबाद, 24 दिसंबर अहमदाबाद नगर निगम (एएमसी) की स्थायी समिति ने गांधी आश्रम परिसर विकास परियोजना के लिए 235 करोड़ रुपये के विभिन्न कार्यों को मंजूरी दी है। एक अधिकारी ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।

अहमदाबाद शहर में स्थित गांधी आश्रम को साबरमती आश्रम के नाम से भी जाना जाता है।

अधिकारी ने कहा कि एएमसी की स्थायी समिति ने गुरुवार को कार्यों के लिए अनुमति दी, जिसमें सड़कों का निर्माण, जल निकासी नेटवर्क और भूमि को भरना शामिल है।

उन्होंने कहा कि विकास कार्यों के लिए रास्ता बनाने को लेकर नगर निकाय ने परियोजना के रास्ते में आ रहे ढांचों को गिराना शुरू कर दिया है।

1,200 करोड़ रुपये मूल्य की गांधी आश्रम स्मारक और सीमा विकास परियोजना, राज्य और केंद्र सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आश्रम को विकसित करके शुरू की गई है, जहां महात्मा गांधी 1917 से 1930 तक रहे थे। यह परियोजना 55 एकड़ क्षेत्र में विकसित की जाएगी, जिसमें मौजूदा पांच एकड़ विरासत भवनों को एक साथ लाना और आसपास के क्षेत्र को मिलाना शामिल है।

एएमसी ने गुरुवार को आश्रम के पास एक दर्जन से अधिक आवासीय इकाइयों - इमारतों को तोड़ना शुरू कर दिया। वहां रहने वाले परिवारों ने उनके पुनर्वास के लिए सरकार द्वारा दिए गए मुआवजे को स्वीकार कर लिया है और इसके बाद ही उन इमारतों और आवासीय इकाइयों को ढहाया जा रहा है।

कई निवासी महात्मा गांधी के साथ यहां बसने आए लोगों के वंशज हैं।

सरकार ने परियोजना के लिए 200 से अधिक परिवारों को स्थानांतरित करने के लिए एक समिति का गठन किया है, जो छह अलग-अलग ट्रस्टों के स्वामित्व वाली भूमि पर रह रहे हैं, जो मूल साबरमती आश्रम का हिस्सा हैं।

परिवारों को घर खरीदने के लिए एकमुश्त पैसे दिये गये हैं या कहीं और नए घर प्रदान किए गए हैं। लेकिन ट्रस्ट परिसर में स्थित एक झुग्गी बस्ती को बिना किसी मुआवजे या पुनर्वास के ध्वस्त करने की एएमसी की योजना की वजह से निवासियों को गुजरात उच्च न्यायालय का रुख करना पड़ा है।

झुग्गीवासियों ने दावा किया कि वे पिछले लगभग 15-20 वर्षों से वहां रह रहे हैं, और उन्हें मलिन बस्तियों के पुनर्वास और पुनर्विकास के लिए विनियमन, 2010 के तहत उनकी झुग्गियों के संरक्षण एवं उनकी आजीविका और मुआवजे का अधिकार प्राप्त है। मामला विचाराधीन है।

परियोजना को गांधीवादियों के प्रतिरोध का भी सामना करना पड़ा, जो इस बात पर जोर देते हैं कि इस क्षेत्र को विश्वस्तरीय स्मारक के रूप में विकसित करने की सरकार की योजना उन्हें स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने यह कहते हुए प्रस्ताव को खुलेआम खारिज कर दिया है कि यह गांधी के विचारों के खिलाफ है।

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