नयी दिल्ली, 13 सितंबर हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता सोहम शाह जब पहली बार मुंबई आए थे तो उनका केवल एक ही सपना था। वह खालिस अंग्रेजी स्टाइल में ‘कैपुचिनो कॉफी’ का ऑर्डर देना चाहते थे। लेकिन अब दो दशक बाद सोहम कहते हैं कि वह छोटे शहर का वही साधारण व्यक्ति बने रहने से खुश हैं जो मसाला चाय पीता है।
राजस्थान के श्रीगंगानगर से आये फिल्म 'तुम्बाड' के अभिनेता और निर्माता ने कहा कि उन्होंने महसूस किया है कि उनके लिए 'जैसे वह हैं वैसा ही बने रहना' बेहतर है। चकाचौंध और ग्लेमर से भरी मुंबई में उनका कैपुचिनो कॉफी से लेकर साधारण मसाला चाय तक का लुत्फ लेने का सफर उनके संघर्ष को बयां करता है।
सोहम शाह ने यहां समाचार एजेंसी 'पीटीआई' मुख्यालय में संपादकों के साथ बातचीत करते हुए कहा, ''मैं दूध से बनी मसाला चाय पीता हूं। ऐसा कहते हैं कि दूध हानिकारक है और मसाला चाय उससे भी ज़्यादा हानिकारक है... यही जीवन की यात्रा है... आपको पता होना चाहिए कि आप कैपुचीनो वाले हैं या मसाला चाय वाले। मैं कैपुचीनो वाला नहीं हूं।''
श्रीगंगानगर में रियल एस्टेट करोबारी 41 वर्षीय शाह ने फिल्म 'शिप ऑफ थिसस', 'तुम्बाड', 'महारानी' और दहाड़ जैसी प्रसिद्ध वेबसीरीज में काम किया है और वह ओटीटी मंच के दर्शकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं।
शाह ने कहा कि एक हिंदी भाषी व्यक्ति से लेकर आज जो वह हैं, वहां तक का उनका सफर अद्वितीय रहा है। अभिनेता ने पीटीआई से कहा, ''मैं जीरो से हीरो बन गया हूं... मुझे अपना सफर बहुत खूबसूरत लगता है। दूसरे शहरों से बहुत से लोग आते हैं। बहुत से निर्माता भी आते हैं। अमीर बच्चे कहते हैं 'पापा पैसे लगाएंगे और मैं अभिनय करूंगा' या फिर खुद ही आ जाते हैं, लेकिन वे सिर्फ एक फ़िल्म बनाते हैं और चले जाते हैं। इस लिहाज़ से मुझे अपना सफर बहुत पसंद है।''
सोहम शाह ने कहा कि जो लोग कहते थे कि तुम कुछ नहीं जानते या तुम्हारे नीचे काम करने वाले तुमसे बेहतर है ऐसे लोगों के बीच तालमेल बैठा पाना मुश्किल था।
उन्होंने कहा, ‘‘ मैं थैरेपिस्ट के पास गया और घंटों तक उनसे बातचीत की।’’
अभिनेता ने कहा,‘‘आपके दिमाग में ये बात रहती है कि यदि आप अंग्रेजी जानते हैं तो आसानी से लोगों के बीच घुलमिल सकते हैं....मुंबई के एक व्यस्त शहर होने के नाते यहां अकेलापन महसूस होता ही है, लेकिन यह ऐसा भी शहर है जो आपको आगे बढ़ने में मदद करता है।
सोहम ने कहा, ''मुझे याद है कि वहां एक कैफे कॉफी डे (सीसीडी कैफे) हुआ करता था। जब मुझमें इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि मैं अपने लिए एक कॉफी का ऑर्डर दे सकूं क्योंकि मैं नहीं जानता था कि मैं यह कैसे कहूं कि 'मुझे एक कप कैपुचीनो चाहिए।' मुझे शर्म आती थी... मेरी रोजी-रोटी सिर्फ मुंबई से ही नहीं चलती थी। यह सिर्फ़ मेरा जुनून था।''
उन्होंने कहा, ''मेरे जीवन का एक पूरा दशक इस सवाल के बारे में सोचते-सोचते निकल गया। मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे अपनी पत्नी और दोस्त आदेश प्रसाद का साथ मिला, जिन्होंने 'तुम्बाड' का सह-लेखन किया था। हम साथ काम करते हैं। उन्होंने मुझे डर के कारण फिल्म न छोड़ने के लिए कहा था।''
शाह के परिवार में उनसे पहले कोई भी मुंबई जैसे बड़े शहर में नहीं गया था। वह श्रीगंगानगर में रहने वाले एक साधारण से परिवार से आते हैं। उनके पिता 3,000 रुपये की तनख्वाह पर पांच बच्चों का पालन-पोषण करते थे।
को बालीवुड में एक बड़ी बाधा बताते हुए शाह ने कहा कि 2010 के दौर में अगर आपको अंग्रेजी नहीं आती है तो मतलब था कि आपको लीड रोल नहीं मिलेंगे । लेकिन अब हिंदी को लेकर माहौल काफी कूल हो गया है।
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)













QuickLY