देश की खबरें | पूर्व प्रधान न्यायाधीश ललित ने संसदीय समिति के समक्ष एक साथ चुनाव कराने के लिए सुझाव दिये

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नयी दिल्ली, 25 फरवरी भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश यू यू ललित ने मंगलवार को ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ (ओएनओई) के लिए दो विधेयकों का अध्ययन कर रही संयुक्त संसदीय समिति को चरणबद्ध तरीके से एक साथ चुनाव कराने समेत कई सुझाव दिए। सूत्रों ने यह जानकारी दी।

सूत्रों ने बताया कि न्यायमूर्ति ललित ने अपने वक्तव्य में कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की अवधारणा सैद्धांतिक रूप से अच्छी है, लेकिन इसके सुचारू क्रियान्वयन के लिए कई कारकों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

ललित के अलावा, भारतीय विधि आयोग के पूर्व अध्यक्ष ऋतुराज अवस्थी ने भी अपने विचार साझा किए। समिति ने विशेषज्ञों और हितधारकों से परामर्श करना शुरू कर दिया है।

सूत्रों ने बताया कि विपक्षी सदस्यों ने इस अवधारणा की आलोचना की। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाद्रा ने दावा किया कि ‘‘एक राष्ट्र एक चुनाव’’ (ओएनओई) विधानमंडलों के कार्यकाल के साथ छेड़छाड़ करके लोकतंत्र को कमजोर करेगा और लोगों के अधिकारों का हनन करेगा।

सूत्रों ने बताया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक सहयोगी दल की ओर से पूछा गया कि क्या दो चुनावों के बीच पांच साल का अंतराल निर्वाचित प्रतिनिधियों की जनता के प्रति जवाबदेही को कमजोर करेगा?

उच्च स्तरीय कोविंद समिति के सचिव आईएएस अधिकारी नितेन चंद्रा और वरिष्ठ अधिवक्ता तथा कांग्रेस के पूर्व सांसद ई एम सुदर्शन नचियप्पन भी समिति के समक्ष पेश हुए। समय की कमी के कारण वे अपने विचार साझा नहीं कर सके और उम्मीद है कि वे बाद में अपने विचार प्रस्तुत करेंगे।

अवस्थी ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से होने वाली बचत और विकास को बढ़ावा मिलने के लाभों के बारे में विस्तार से बताया।

अवस्थी ने संसद की संयुक्त समिति से कहा कि प्रस्तावित उपाय संघवाद के मूल ढांचे के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करता है और यह संविधान के लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है।

न्यायमूर्ति अवस्थी, जो अब भ्रष्टाचार विरोधी संस्था लोकपाल के सदस्य हैं, ने समिति के सदस्यों से यह भी कहा कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए कानूनी ढांचा तैयार करने वाला यह विधेयक पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है।

उन्होंने कहा कि संविधान (129वां संशोधन) विधेयक में देश में एक साथ चुनाव कराने के लिए सभी तत्व मौजूद हैं।

उनकी अध्यक्षता में विधि समिति ने एक साथ चुनाव कराने पर एक मसौदा रिपोर्ट तैयार की थी।

ऐसा माना जा रहा है कि उन्होंने समिति को बताया कि उनके अनुसार यह विधेयक संवैधानिकता का उल्लंघन नहीं करता है।

न्यायमूर्ति अवस्थी ने कहा कि यह विधेयक संघवाद और सरकार के संसदीय स्वरूप के मूल ढांचे के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करता है।

पच्चीस फरवरी की बैठक के लिए संसदीय समिति के एजेंडे को संक्षेप में ‘‘कानूनी विशेषज्ञों के साथ बातचीत’’ के रूप में सूचीबद्ध किया गया।

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में मोदी सरकार ने ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ पर उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था और इसने अपनी रिपोर्ट में इस अवधारणा का जोरदार समर्थन किया था।

इसके बाद, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया और सरकार ने लोकसभा में दो विधेयक पेश किये, जिनमें से एक संविधान संशोधन विधेयक भी था।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सांसद एवं पूर्व कानून मंत्री पी पी चौधरी की अध्यक्षता में 39 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति गठित की थी।

संसदीय समिति ने मंगलवार की बैठक को छोड़कर अब तक दो बैठकें की हैं, जिनमें अपने एजेंडे का व्यापक विवरण तैयार किया है और परामर्श के लिए हितधारकों और विशेषज्ञों की सूची दी गई है।

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