देश की खबरें | यूएई जलवायु वार्ता में मीथेन उत्सर्जन कम करने पर ध्यान, भारत रह सकता है तटस्थ

नयी दिल्ली, 28 नवंबर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता में मीथेन उत्सर्जन पर व्यापक वार्ता होने की उम्मीद है। खासकर चीन के अपनी 2035 की जलवायु योजना में इसे संभावित ग्रीनहाउस गैस के रूप में शामिल करने की हालिया प्रतिबद्धता के मद्देनजर इस विषय पर विशेष चर्चा की संभावना है।

मीथेन दूसरी सबसे प्रमुख ग्रीन हाउस गैस है जिसमें ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने में कार्बन डाई ऑक्साइड की तुलना में अधिक खतरनाक क्षमता है।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसका भारत पर उल्लेखनीय असर नहीं पड़ेगा क्योंकि देश पहले से ही कृषि केंद्रित उन पहलों को लागू कर रहा है जो जलवायु में सह-लाभकारी हैं।

अमेरिका और यूरोपीय संघ ने मीथेन पर कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया जो पूर्व औद्योगिक काल (1850-1900) से करीब 30 प्रतिशत ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार है।

इस साल की जलवायु वार्ता (सीओपी28) की मेजबानी कर रहे यूएई द्वारा भी प्रमुख तेल एवं गैस कंपनियों से मीथेन उत्सर्जन कम करने के लिए प्रतिबद्धता जताने की घोषणा करने की उम्मीद है।

ईयू और अमेरिका ने संयुक्त रूप से 2020 के स्तर की तुलना में 2030 तक दुनिया भर में मीथेन उत्सर्जन को 30 प्रतिशत तक कम करने के लिए 2021 में ‘‘वैश्विक मीथेन संकल्प’’ शुरू किया था। लगभग 150 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन चीन, भारत और रूस प्रमुख उत्सर्जकों में से हैं जिनका अब भी इसमें शामिल होना बाकी है।

इस महीने की शुरुआत में दुनिया के शीर्ष दो कार्बन उत्सर्जक देशों अमेरिका और चीन ने ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए अपनी 2035 की राष्ट्रीय योजनाओं में मीथेन को शामिल करने का वादा किया था। यह पहली बार है कि चीन ने ऐसा वादा किया है हालांकि इसके लिए उसने कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत को भी इस दिशा में सोचने के लिए मजबूर कर सकता है।

नयी दिल्ली स्थित स्वतंत्र जलवायु विचार समूह काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के एक शोधार्थी वैभव चतुर्वेदी ने कहा, ‘‘मीथेन उत्सर्जन को लेकर लंबे समय से अकादमिक बहस होती रही है, लेकिन अब इसे भू-राजनीतिक वार्ता में एक बड़े मुद्दे के रूप में पेश किया जा रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर कोई मीथेन संकल्प से सहमत होगा, लेकिन इससे कई राष्ट्र यह सोचने के लिए मजबूर होंगे कि मीथेन उत्सर्जित करने वाले क्षेत्रों में आंतरिक रूप से क्या हो रहा है।’’

पर्यावरण मंत्रालय के एक सूत्र ने कहा कि 2035 की जलवायु योजनाओं में मीथेन को शामिल करने के चीन के संकल्प से कृषि क्षेत्र से उत्सर्जित मीथेन पर ‘‘भारत का रुख प्रभावित होने की संभावना नहीं है’’।

सीओपी27 में कृषि से उत्सर्जन पर चर्चा के दौरान भारत ने जीवनशैली में बदलाव के माध्यम से अपने उत्सर्जन को कम करने के बजाय ‘‘विदेश में सस्ते समाधान खोजने’’ के लिए अमीर देशों की आलोचना की थी।

भारत ने दलील दी थी कि कृषि उत्सर्जन ‘‘जीवित रहने के लिए उत्सर्जन है’’ न कि यह ‘‘विलासिता के लिए उत्सर्जन’’ है।

चतुर्वेदी ने कहा, ‘‘भारत में 60 प्रतिशत से अधिक मीथेन उत्सर्जन पशुधन क्षेत्र से होता है, इसके बाद चावल की खेती से मीथेन उत्सर्जन होता है। दोनों क्षेत्रों से निपटना हमारे लिए बहुत जटिल है।’’

नयी दिल्ली स्थित जलवायु विचार समूह के प्रमुख चंद्र भूषण ने कहा कि भारत वर्तमान में फसलों के विविधिकरण पर ध्यान दे रहा है और धान के बजाय मोटे अनाज का उत्पादन कर रहा है जिससे मीथेन के उत्सर्जन में कमी लाने में मदद मिल सकती है।

जलवायु नीति विशेषज्ञ ने कहा, ‘‘भारत ‘‘हर बूंद अधिक फसल’’ नामक योजना के माध्यम से जल संरक्षण पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। साथ ही, जैविक यूरिया के उपयोग को बढ़ाने के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया गया है। इन कदमों के जलवायु सह-लाभ हैं।’’

उन्होंने सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन (एसआरआई) को अपनाने की भी वकालत की। कृषि की इस पद्धति से धान की पैदावार बढ़ा सकती है और मीथेन उत्सर्जन को कम करने और पानी के संरक्षण में मदद मिल सकती है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार, पूर्व-औद्योगिक काल से मीथेन लगभग 30 प्रतिशत ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार है और 1980 के दशक में रिकॉर्ड रखने की शुरुआत के बाद से यह किसी भी अन्य समय की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है।

मीथेन प्राकृतिक स्रोतों और मानवीय गतिविधियों दोनों से आता है। नासा का अनुमान है कि आज का लगभग 60 प्रतिशत मीथेन उत्सर्जन मानवीय गतिविधियों के कारण होता है।

कार्बन डाई ऑक्साइड वायुमंडल में सैकड़ों से हजारों वर्षों तक बनी रहती है। अगर इसका उत्सर्जन तुरंत कम भी कर दिया जाए तब भी सदी के अंत तक इस कमी का जलवायु पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

इसके विपरीत मीथेन का वायुमंडलीय जीवनकाल बहुत कम (लगभग 12 वर्ष) होता है, लेकिन यह बहुत अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जो वायुमंडल में मौजूद रहते हुए बहुत अधिक ऊर्जा अवशोषित करती है।

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि 2030 तक मानव-जनित मीथेन उत्सर्जन को 45 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। इस कमी से 2045 तक ग्लोबल वार्मिंग में लगभग 0.3 डिग्री सेल्सियस की कमी हो सकती है।

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