देश की खबरें | न्यायेतर स्वीकारोक्ति एक कमजोर साक्ष्य: न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि न्यायेतर स्वीकारोक्ति एक कमजोर साक्ष्य है और बिना किसी पुष्टि के केवल इस पर आधारित दोषसिद्धि को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

नयी दिल्ली, चार अप्रैल उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि न्यायेतर स्वीकारोक्ति एक कमजोर साक्ष्य है और बिना किसी पुष्टि के केवल इस पर आधारित दोषसिद्धि को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ ने भ्रष्टाचार के एक मामले में सेना के एक अधिकारी को बरी और बहाल करते हुए यह टिप्पणी की।

न्यायेतर स्वीकारोक्ति किसी पुलिस अधिकारी के सामने नहीं किए गए अपराध की स्वीकारोक्ति है।

पीठ ने कहा, "इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि न्यायेतर स्वीकारोक्ति साक्ष्य का एक कमजोर टुकड़ा है। जब तक इस तरह की किसी स्वीकारोक्ति को स्वैच्छिक, भरोसेमंद और विश्वसनीय नहीं पाया जाता है, तब तक केवल उसी के आधार पर दोषसिद्धि, बिना पुष्टि के उचित नहीं होगी।"

शीर्ष अदालत सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी), क्षेत्रीय पीठ, कोच्चि द्वारा पारित निर्णयों और आदेशों को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई कर रही थी।

न्यायाधिकरण ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा-7 के तहत, सेना अधिनियम, 1950 की धारा-69 के साथ पठित-दोषसिद्धि के आदेश और सेवा से बर्खास्तगी की सजा तथा जनरल कोर्ट मार्शल (जीसीएम) द्वारा सुनाई गई एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा को दरकिनार कर दिया था।

जीसीएम ने सेना अधिनियम की धारा 63 के तहत एक सैन्य अधिकारी को दोषी ठहराया था और मेजर के पद की उसकी वरिष्ठता छीने जाने की सजा सुनाई थी।

एएफटी ने यह भी निर्देश दिया है कि अधिकारी को सेवा से बाहर रहने की अवधि के लिए बिना किसी वेतन और भत्ते के सेवा में बहाल किया जाए, लेकिन बिना किसी सेवा विराम के।

अभियोजन पक्ष का यह मामला था कि अधिकारी विभिन्न स्थानों पर आयोजित भर्ती रैलियों में कुछ उम्मीदवारों को चिकित्सकीय रूप से फिट घोषित करने में कदाचार का दोषी था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि जीसीएम ने मूल रूप से अधिकारी द्वारा दिए गए इकबालिया बयान के आधार पर दोषसिद्धि का आदेश दिया है और वर्तमान मामले में इसकी कोई पुष्टि नहीं है।

न्यायालय ने अधिकारी के वकील गौरव अग्रवाल की इस दलील से सहमति जताई कि उनके मुवक्किल द्वारा दिया गया इकबालिया बयान स्वैच्छिक नहीं था।

शीर्ष अदालत ने भारत संघ की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी की इस दलील से सहमत होने से इनकार कर दिया कि एएफटी को सबूतों के पुनर्मूल्यांकन की अनुमति नहीं है।

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