देश की खबरें | सात साल बाद भी सरकार, न्यायालय के बीच एमओपी पर सहमति नहीं बनने पर संसदीय समिति ने जताई हैरानी
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नयी दिल्ली, पांच जनवरी संसद की एक समिति ने इस बात पर आश्चर्य जताया है कि सरकार और उच्चतम न्यायालय का कॉलेजियम करीब सात साल बाद भी शीर्ष अदालत तथा उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और तबादले से संबंधित प्रक्रिया ज्ञापन (एमओपी) पर आम सहमति बनाने में विफल रहे हैं।
एक हालिया रिपोर्ट में, विधि एवं न्याय और कार्मिक विभाग से संबंधित स्थायी समिति ने कहा कि शीर्ष अदालत की टिप्पणियों के संदर्भ में सरकार और न्यायपालिका से संशोधित एमओपी को अंतिम रूप देने की उम्मीद की जाती है, ‘‘जो अधिक सक्षम और पारदर्शी हों।’’
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा, ‘‘समिति यह जानकर हैरान है कि शीर्ष अदालत और सरकार संवैधानिक अदालतों (शीर्ष अदालत और 25 उच्च न्यायालयों) में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए ज्ञापन प्रक्रिया (एमओपी) में संशोधन पर आम सहमति पर पहुंचने में विफल रही है, जबकि दोनों लगभग सात साल से इस पर विचार कर रहे हैं।’’
कानून मंत्रालय के न्याय विभाग द्वारा साझा किए गए विवरण का हवाला देते हुए संसदीय समिति ने कहा कि सरकार और शीर्ष अदालत कॉलेजियम ने प्रस्तावित संशोधित एमओपी पर कई मौकों पर विचारों का आदान-प्रदान किया है।
विभिन्न उच्च न्यायालयों में रिक्तियों का उल्लेख करते हुए, समिति की रिपोर्ट ने न्याय विभाग द्वारा प्रदान किए गए विवरणों का हवाला दिया और बताया कि 2021 में उच्च न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा 251 सिफारिशें की गई थीं।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए मौजूदा एमओपी के अनुसार, संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के लिए रिक्तियां होने से छह महीने पहले न्यायाधीशों की रिक्तियों को भरने के लिए एक प्रस्ताव भेजना आवश्यक है।
सरकार केवल उन्हीं को उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त करती है, जिनकी सिफारिश शीर्ष अदालत के कॉलेजियम द्वारा की जाती है।
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