देश की खबरें | निर्वाचन आयोग को ‘संस्थागत अहंकार’ नहीं रखना चाहिए, एसआईआर पर करे पुनर्विचार : अभिषेक मनु सिंघवी
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नयी दिल्ली, 27 जुलाई कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने रविवार को कहा कि निर्वाचन आयोग को “संस्थागत अहंकार” नहीं रखना चाहिए और बिहार में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान को रोकना चाहिए।
भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सांसद मनोज झा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नेता नीलोत्पल बसु के साथ यहां आयोजित एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में सिंघवी ने कहा कि निर्वाचन आयोग द्वारा की जा रही कवायद एक “नागरिकता परीक्षा” बन गई है और उन्होंने इसकी वैधता पर सवाल उठाया।
उन्होंने निर्वाचन आयोग से राज्य विधानसभा चुनावों से पहले यह अभ्यास कराने के अपने फैसले को वापस लेने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा, “मैं निर्वाचन आयोग से विनम्रतापूर्वक अनुरोध करता हूं कि यह राजनीतिक हठ का मामला नहीं है। यह संस्थागत अहंकार का मामला नहीं है। कृपया इस पर पुनर्विचार करें। हर कोई आपसे आग्रह कर रहा है।”
सिंघवी ने राज्य चुनावों से पहले इस प्रक्रिया में जल्दबाजी करने की आवश्यकता पर सवाल उठाया और पूछा कि क्या यह नागरिकता परीक्षण है। उन्होंने कहा, “निर्वाचन आयोग द्वारा जारी विभिन्न बयानों से संकेत मिलता है कि यह नागरिकता संबंधी कार्य है।” कांग्रेस नेता ने कहा, “इसने बार-बार कहा है कि आधार, मतदाता फोटो पहचान पत्र या राशन कार्ड क्यों स्वीकार नहीं किए जा रहे हैं। इसका मतलब है कि वे नागरिकता का सबूत चाहते हैं। सवाल यह है कि क्या निर्वाचन आयोग को नागरिकता की जांच करने का अधिकार है?”
सिंघवी ने कहा, “अदालत इस प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं पर गौर करेगी। लेकिन अगर निर्वाचन आयोग में संस्थागत अहंकार या राजनीतिक हठधर्मिता नहीं है, तो वह इसे अभी आसानी से रोक सकता है और चुनाव के बाद कर सकता है। इसे दो महीने बाद होने वाले किसी खास चुनाव से जोड़ने का कोई मतलब नहीं है।”
भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि निर्वाचन आयोग के “आत्म-प्रशंसात्मक” दावे उनकी आशंकाओं की पुष्टि कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, “वे सभी प्रकार के आत्म-प्रशंसात्मक और भ्रामक दावे कर रहे हैं। हमने सुना है कि 65 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटा दिए जाएंगे। निर्वाचन आयोग का दावा मूलतः हमारी आशंकाओं की पुष्टि करता है।”
राष्ट्रीय जनता दल के मनोज झा ने कहा कि इस प्रक्रिया के बारे में राजनीतिक दलों से परामर्श नहीं किया गया और उन्होंने इसे आजादी के बाद से मताधिकार से वंचित करने की सबसे बड़ी प्रक्रिया बताया।
झा ने कहा, “मुझे उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय इसे गंभीरता से लेगा। स्वतंत्र भारत में इस पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने का कोई दूसरा प्रयास नहीं हुआ है।”
माकपा नेता नीलोत्पल बसु ने इसे गरीबों को मताधिकार से वंचित करने की कवायद बताया।
उन्होंने कहा, “हमारे यहां समावेशी लोकतंत्र है। हमारा उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को यथासंभव सार्वभौमिक बनाना है। यह कवायद लोकतंत्र की मूल अवधारणा के खिलाफ है।”
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(The above story first appeared on LatestLY on Jul 27, 2025 08:08 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

