देश की खबरें | कोविड-19 की वजह से आर्थिक मंदी ‘आंतरिक अशांति’ के दायरे में नहीं आती: न्यायालय
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि कोविड-19 की वजह से आर्थिक मंदी ‘आंतरिक अशांति’ के दायरे में नहीं आती, जिससे देश की सुरक्षा को खतरा हो। न्यायालय ने इसके साथ ही गुजरात सरकार की वह अधिसचूना निरस्त कर दी जिसमें फैक्टरियों को श्रमिकों के प्रति कतिपय दायित्व का पालन नहीं करने की छूट दी गयी थी।
नयी दिल्ली, एक अक्ट्रबर उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि कोविड-19 की वजह से आर्थिक मंदी ‘आंतरिक अशांति’ के दायरे में नहीं आती, जिससे देश की सुरक्षा को खतरा हो। न्यायालय ने इसके साथ ही गुजरात सरकार की वह अधिसचूना निरस्त कर दी जिसमें फैक्टरियों को श्रमिकों के प्रति कतिपय दायित्व का पालन नहीं करने की छूट दी गयी थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि महामारी की वजह से उत्पन्न आर्थिक संकट ने निश्चित ही शासन के समक्ष अभूतपूर्व चुनौतियां खड़ी कर दीं, जिनका राज्य सरकार को केन्द्र के साथ तालमेल करके समाधान खोजना होगा।
न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति के एम जोसफ की पीठ ने कहा कि मानवीय कार्य स्थितियां और कानून के तहत देय ओवरटाइम के भुगतान से इंकार करना श्रमिकों के जीने के अधिकार और जबरन मजदूरी के खिलाफ अधिकार का अनादर है।
शीर्ष अदालत ने यह फैसला उस याचिका पर दिया जिसमें गुजरात सरकार के श्रम और रोजगार विभाग की 17 अप्रैल और 20 जुलाई की अधिसूचना को चुनौती दी गयी थी। ये अधिसूचनायें कानून के तहत पंजीकृत फैक्टरियों को साप्ताहिक काम के घंटे, दैनिक घंटे, श्रमिकों को बीच में अवकाश तथा ऐसे अन्य प्रावधानों से छूट प्रदान करती थीं।
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पीठ ने अपने फैसले में कहा कि फैक्टरी कानून की धारा पांच सार्वजनिक आपात स्थिति के बारे में है और इस धारा के तहत अधिसूचना 17 अप्रैल को जारी की गयी थी। इसमें कहा गया था कि इसका मकसद 20 अप्रैल से 19 जुलाई के दरम्यान औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों को कतिपय छूट प्रदान करना है।
बाद में 20 जुलाई को एक अन्य अधिसूचना जारी की गयी जिसमें यह छूट 19 अक्टूबर तक बढ़ा दी गयी।
पीठ ने कहा कि महामारी और राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार श्रमजीवी वर्ग और गरीबों में भी सबसे गरीब तबके ने झेली है और सामाजिक सुरक्षा के अभाव में उन्हें विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ा।
पीठ ने कहा कि इन अधिसूचनाओं की वैधता इस सवाल पर निर्भर है कि क्या कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन फैक्टरी कानून की धारा पांच में परिभाषित सार्वजनिक आपात स्थिति के दायरे में आता है।
पीठ ने कहा, ‘‘अगर हम प्रतिवादी (गुजरात) की इस दलील को स्वीकार भी लें कि महामारी से आंतरिक अशांति हुयी, तो भी हम पाते हैं कि कोविड-19 महामारी द्वारा उत्पन्न आर्थिक मंदी राष्ट्र की सुरक्षा के लिये खतरा बनने वाली आंतरिक अशांति नहीं है। महामारी ने वर्तमान, विशेषकर सार्वजनिक स्वास्थ्य, बुनियादी सुविधाओं पर जर्बदस्त भार डाला है और इसकी वजह से आर्थिक गतिविधियों में तेजी से गिरावट आयी है।’’
पीठ ने कहा, ‘‘भारत सरकार ने आपदा प्रबंधन कानून, 2005 के प्रावधानों के तहत कदम उठाये हैं। हालांकि, इसने देश या इसके भूभाग के किसी हिस्से की सुरक्षा को इस तरह से प्रभावित नहीं किया है, जिससे देश की शांति और अखंडता को खतरा हो।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तक आर्थिक संकट इतना गंभीर नहीं हो कि इससे भारत की सार्वजनिक व्यवस्था और देश या इसके भूभाग के किसी हिस्से की सुरक्षा को खतरा हो तब तक ऐसे अधिकारों का सहारा नहीं लिया जा सकता, जिनका इस्तेमाल कानून के तहत ‘बमुश्किल’ किया जाना हो।
न्यायालय ने कहा कि ये अधिसूचनायें राज्य में सभी फैक्टरियों के ऊपरी खर्चों को कम करने के अलावा उपयोगी नहीं है।
पीठ ने कहा कि इस तरह से आंख मूंद कर सभी फैक्टरियों को छूट देने का मकसद महामारी के नाम पर पहले से ही दबाव में जिंदगी गुजार रहे कामगारों को ओवरटाइम जैसी सुविधा से वंचित करना है।
न्यायालय ने कहा कि भारत का संविधान ‘परिवर्तनशील दृष्टिकोण’ की देन है जिसका लक्ष्य सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र हासिल करना है और श्रमिक कल्याण इसी दृष्टिकोण का अभिन्न तत्व है।
न्यायालय ने कहा, ‘‘एक ओर श्रमिक कल्याण की रक्षा करने और दूसरी ओर महामारी से उत्पन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य के संकट से निबटने के लिये सावधानी पूर्वक संतुलन बनाने की जरूरत है। लेकिन ये संतुलन कानून के शासन के अनुरूप होने चाहिए।’’
न्यायालय ने कहा, ‘‘इसकी इस तरह से व्याख्या नहीं की जा सकती जो नयी चुनौतियों से निबटने के लिये कार्यस्थलों पर सम्मान और समता को बढ़ावा देने वाले प्रावधानों को खत्म करने का अधिकार राज्य प्रशासन को देता हो।’’
पीठ ने महामारी के संकट के दौरान उत्पादन बंद हो जाने की वजह से बड़ी संख्या में कामगारों का अपने कार्यस्थलों को छोड़कर अपने पैतृक स्थानों को लौटने की बाध्यता की घटना का जिक्र किया, जिसने उनकी आमदनी के स्रोत को ही खत्म कर दिया।
पीठ ने कहा, ‘‘श्रमिकों के जीवन का अधिकार उसके नियोक्ता या सरकार की अनिश्चितता के रहम पर नहीं हो सकता है। श्रमिकों को कानून द्वारा प्रदान की गयी काम की शर्तें और ओवरटाइम के भुगतान से इंकार करने संबंधी ये अधिसूचनायें संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 में प्रदत्त श्रमिकों के जीने के अधिकार और जबरन काम कराने के खिलाफ अधिकार का अनादर है।’’
न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 में प्रदत्त अपने असाधारण अधिकार का इस्तेमाल करते हुये निर्देश दिया कि ये अधिसूचनायें जारी होने के बाद से काम कर रहे श्रमिकों, जो फैक्टरी कानून के प्रावधानों के तहत पात्र हैं, को ओवरटाइम का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
अनूप
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