देश की खबरें | आर्थिक अपराध गंभीर, लेकिन आरोपों की गंभीरता सुनवाई-पूर्व कारावास को उचित नहीं ठहरा सकती : उच्च न्यायालय
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि आर्थिक अपराध गंभीर प्रकृति के होते हैं, लेकिन कोई भी सजा दोषसिद्धि के बाद ही होनी चाहिए, क्योंकि केवल आरोपों की गंभीरता सुनवाई-पूर्व कारावास को उचित नहीं ठहरा सकती।
नयी दिल्ली, 19 जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि आर्थिक अपराध गंभीर प्रकृति के होते हैं, लेकिन कोई भी सजा दोषसिद्धि के बाद ही होनी चाहिए, क्योंकि केवल आरोपों की गंभीरता सुनवाई-पूर्व कारावास को उचित नहीं ठहरा सकती।
कंपनी अधिनियम के प्रावधानों के कथित उल्लंघन के लिए गंभीर कपट अन्वेषण कार्यालय (एसएफआईओ) द्वारा जांच किए गए एक मामले में मेसर्स पारुल पॉलीमर प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक को जमानत देते हुए अदालत ने यह टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति अनुप जयराम भंभानी ने आदेश में कहा है, ‘‘यह कहने की जरूरत नहीं है कि इस फैसले में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आर्थिक अपराध गंभीर प्रकृति के हैं और याचिकाकर्ता तथा अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ आरोप, यदि मुकदमे में साबित हो जाते हैं, तो अपेक्षित सजा मिलनी चाहिए।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि, यह सजा दोषसिद्धि के बाद होनी चाहिए और केवल आरोपों की गंभीरता सुनवाई-पूर्व कारावास के लिए उचित नहीं हो सकती है।’’
कंपनी और अन्य आरोपी व्यक्तियों पर वित्तीय अनियमितताओं में शामिल होने का आरोप लगाया गया था, जिससे कंपनी अधिनियम का उल्लंघन हुआ।
याचिकाकर्ता को जांच और कार्यवाही के दौरान कभी गिरफ्तार नहीं किया गया। उसे अदालत द्वारा जारी किए गए समन के अनुसार 25 मई, 2022 को पेश होने के बाद हिरासत में ले लिया गया और फिर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि जांच अधिकारी ने छह साल की जांच में याचिकाकर्ता को कभी गिरफ्तार नहीं किया और यहां तक कि उस चरण में जब विशेष अदालत के समक्ष अंतिम जांच रिपोर्ट दायर की गई तब भी जांच अधिकारी ने उसकी हिरासत का अनुरोध नहीं किया।
अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को पांच लाख रुपये के मुचलके और इतनी ही राशि की दो जमानत राशि पर रिहा किया जाए।
याचिकाकर्ता को सशर्त जमानत देते हुए अदालत ने जांच अधिकारी को याचिकाकर्ता के खिलाफ लुक-आउट-सर्कुलर जारी करने के लिए आव्रजन ब्यूरो, गृह मंत्रालय या अन्य उपयुक्त प्राधिकारी से अनुरोध करने का निर्देश दिया ताकि वह विशेष अदालत की अनुमति के बिना देश से बाहर नहीं जा सके।
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