देश की खबरें | चटगांव हिल्स के चकमा: 15 अगस्त को भारतीय, दो दिन बाद पाकिस्तानी,19 अगस्त तक बागी
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कोलकाता,19 अगस्त हर साल चकमा आदिवासी समुदाय के अलग-अलग समूह देश के विभिन्न हिस्सों में तख्तियां लेकर एकत्र होते हैं और 17 अगस्त 1947 को ‘काला दिवस’ मनाते हैं।
चकमा जनजाति ने 75 साल पहले चटगांव हिल्स में अपने इलाके को भारत का हिस्सा बनाने के लिए विद्रोह किया था। हालांकि उनका यह विद्रोह अल्पकालिक रहा था। उस समय से, इस जनजाति के बिखरे हुए प्रवासी उस नुकसान को भूल नहीं सके हैं।
चटगांव हिल्स ट्रैक्ट (चटगांव पहाड़ी क्षेत्र) के करीब 13,000 वर्ग किमी क्षेत्र में रहने वाली चकमा, त्रिपुरी और अन्य जनजातियों ने अपनी नई नागरिकता प्रदर्शित करने के लिए रंगमाटी स्थित उपायुक्त के बंगले पर 15 अगस्त 1947 को तिरंगा फहराने का फैसला किया था।
त्रिपुरा विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक गौतम चकमा ने कहा, ‘‘मेरे पिता स्नेह कुमा चकमा चटगांव पहाड़ी क्षेत्र के लिए संविधान सभा की ऑल इंडिया एक्सक्लुडेड एरियाज सब-कमेटी के सदस्य थे। उन्होंने जिले के तत्कालीन उपायुक्त जी एल हाइद के साथ बातचीत की थी और पहाड़ी क्षेत्र को भारत का हिस्सा माने जाने के बाद 15 अगस्त 1947 की सुबह भारतीय ध्वज फहराया था। ’’
हालांकि, उनकी खुशी अल्पकालिक रही। भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा निर्धारित करने से संबद्ध रेडक्लिफ घोषणा के बाद 17 अगस्त की शाम यह पता चला कि चटगांव पहाड़ी क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिया गया है।
कुछ दिनों बाद, बलूच रेजीमेंट ने वहां मार्च किया और तिरंगा हटाकर पाकिस्तानी ध्वज लगा दिया।
स्नेह चकमा और उनके सहयोगियों को गद्दार करार देते हुए उनके खिलाफ एक गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया।
चकमा आदिवासियों का दावा है कि सर सिरील रेडक्लिफ ने पहाड़ी क्षेत्र को भारत के साथ बनाये रखने के पक्ष में न्यायमूर्ति बिजान मुखर्जी और न्यायमूर्ति चारू विश्वास (बंगाल सीमा आयोग के गैर मुस्लिम सदस्यों) द्वारा लिखित सात पृष्ठों की दलील खारिज कर दी तथा वह इसे पाकिस्तान को देने पर सहमत हो गए।
उल्लेखनीय है कि चकमा ने अपने ज्ञापन में और न्यायमूर्ति मुखर्जी तथा न्यायमूर्ति विश्वास ने अपनी दलीलों में इस बात का जिक्र किया था कि पहाड़ी क्षेत्र में 98 प्रतिशत बौद्ध आबादी है।
प्रोफेसर चकमा ने कहा, ‘‘बर्दवान के महाराजा ने मेरे पिता को कुछ ली एनफिल्ड राइफल और गोलाबारूद की पेशकश की थी लेकिन ज्यादातर भारतीय नेताओं ने सशस्त्र विद्रोह करने के बजाय कानूनी लड़ाई लड़ने की सलाह दी।’’
चटगांव पहाड़ी क्षेत्र में अब भी करीब सात लाख चकमा रहते हें। उनकी ज्यादातर पैतृक भूमि पर मैदानी इलाकों के लोगों ने बांग्लादेशी सेना की मदद से कब्जा किया हुआ है।
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