देश की खबरें | राजनीतिक दलों में टूट, विलय की अनुमति से जुड़े संवैधानिक प्रावधान के खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका दायर
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मुंबई, 28 अगस्त बंबई उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर कर राजनीतिक दलों के ‘विभाजन और विलय’ के लिए संविधान की 10वीं अनुसूची में उपलब्ध पैराग्राफ को अवैध घोषित करने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में, इस पैराग्राफ को संविधान के मूल ढांचे के विरूद्ध घोषित करने का भी अनुरोध किया गया है।
याचिकाकर्ता मीनाक्षी मेनन ने दावा किया है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल राजनीतिक दलों के नेता सामूहिक दल-बदल के लिए करते हैं और इस तरह के सामूहिक दल-बदल होने से मतदाताओं के साथ विश्वासघात होता है।
मेनन मीडिया और मार्केटिंग के पेशे से जुड़ी हुई हैं।
जनहित याचिका में कहा गया है कि संविधान की 10वीं अनुसूची के चौथे पैराग्राफ के तहत ‘टूट या विलय के रूप में सामूहिक दल-बदल’ राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन गया है, जो मतदाताओं के साथ पूर्ण विश्वासघात है।
इसमें कहा गया है कि इस प्रावधान के तहत टूट और विलय के रूप में दल-बदल के कारण आम आदमी चुनावी प्रक्रिया से दूर होता जा रहा है, जिनमें (चुनावों में) बगैर किसी जवाबदेही के करदाताओं के हजारों करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं।
अधिवक्ता अहमद अब्दी और एकनाथ धोकले ने मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति आरिफ डॉक्टर की खंडपीठ के समक्ष सोमवार को जनहित याचिका का उल्लेख किया।
पीठ ने वकीलों को निर्देश दिया कि पहले वे उच्च न्यायालय के रजिस्ट्री विभाग द्वारा याचिका में जताई गई आपत्तियों को हटायें और फिर दोबारा याचिका का उल्लेख करें।
याचिका में अदालत से यह घोषित करने का अनुरोध किया गया है कि मूल राजनीतिक पार्टी से दल-बदल करने वाले विधायकों या विधायकों के समूह सदन की कार्यवाही में भाग लेने, या तब तक कोई संवैधानिक पद धारण करने के हकदार नहीं हैं, जब तक कि उनकी अयोग्यता से जुड़े मुद्दे का अंतत: समाधान नहीं हो जाता।
मेनन ने कहा कि याचिका महाराष्ट्र के जून 2022 के राजनीतिक संकट के मद्देनजर दायर की गई है। यह संकट तब शुरू हुआ था, जब मौजूदा मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना से बड़ी संख्या में विधायक दल-बदल कर गये, जिससे राज्य की महा विकास आघाड़ी (एमवीए) सरकार गिर गई।
याचिका में कहा गया है कि हाल में, अपने चाचा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) प्रमुख शरद पवार के खिलाफ अजित पवार द्वारा की गई बगावत तथा उद्धव नीत एमवीए सरकार के खिलाफ शिंदे के नेतृत्व में किये गये विद्रोह में काफी समानताएं हैं।
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