देश की खबरें | उप्र के कारागार महानिदेशक बताएं, कैदियों को समय-पूर्व रिहाई के लिए क्या कदम उठाए गए : न्यायालय
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को उत्तर प्रदेश के जेल महानिदेशक से राज्य में कैदियों को सजा में छूट का लाभ देने के लिए अब तक उठाए गए कदमों के बारे में विवरण देते हुए व्यक्तिगत तौर पर एक हलफनामा दाखिल करे।
नयी दिल्ली, पांच जनवरी उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को उत्तर प्रदेश के जेल महानिदेशक से राज्य में कैदियों को सजा में छूट का लाभ देने के लिए अब तक उठाए गए कदमों के बारे में विवरण देते हुए व्यक्तिगत तौर पर एक हलफनामा दाखिल करे।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल छह सितंबर को सजा में छूट को लेकर राज्य सरकार की उल्लेखित नीति पर गौर किया था जिसमें कहा गया था कि दोषियों को समय पूर्व रिहाई के लिए आवेदन जमा करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी और उनके मामलों पर जेल अधिकारी स्वत: ही विचार करेंगे।
न्यायालय ने राज्य सरकार से 2018 की अपनी नीति में निर्धारित मानदंडों का पालन करने के लिए चार महीने के भीतर 512 कैदियों की समय से पहले रिहाई के मुद्दे पर विचार करने के लिए कहा था। ये कैदी आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं और इन्होंने शीर्ष अदालत में अपील की थी।
प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कैदियों को छूट दिए जाने के मुद्दे पर सुनवाई करते हुए राज्य से यह जानकारी देने को भी कहा कि प्रत्येक जिले की जेलों में कितने दोषी हैं, जो समय पूर्व रिहाई के पात्र हैं। पीठ में न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा भी शामिल थे।
पीठ ने कहा, “इस मामले के फैसले के बाद से कितने मामलों में समय पूर्व रिहाई के लिए विचार किया गया है...?”
शीर्ष अदालत ने राज्य के अधिकारियों के पास समय पूर्व रिहाई के लंबित मामलों का विवरण मांगते हुए यह भी जानना चाहा कि इन पर कब तक विचार किया जाएगा।
महानिदेशक (कारागार) को तीन सप्ताह में व्यक्तिगत हलफनामा देने का निर्देश देते हुए पीठ ने कहा कि दस्तावेज में “निर्णय के अनुसरण में उठाए गए कदमों और की गई संस्थागत व्यवस्था” का विवरण शामिल होना चाहिए।
पीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को भी नोटिस जारी किया और इस मामले में अदालत की सहायता के लिए वकील ऋषि मल्होत्रा को ‘न्याय मित्र’ नियुक्त किया।
न्यायालय ने इसके अलावा मामले में सुनवाई की अगली तारीख तक 52 दोषियों की सजा में छूट की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी, जिन्होंने अपनी शिकायतों को लेकर न्यायालय से संपर्क किया था।
पिछले साल सितंबर में रशीदुल जाफर के मामले का फैसला करते हुए शीर्ष अदालत ने कई निर्देश जारी किए थे। न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को 512 कैदियों की समय से पहले रिहाई के मुद्दे पर चार महीने के भीतर विचार करते हुए उसकी 2018 की नीति में निर्धारित मानदंडों का पालन करने के लिए कहा था। ये कैदी आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं और न्यायालय के समक्ष पहुंचे थे।
पीठ ने कहा था, “हम तदनुसार निर्देश देते हैं कि मौजूदा मामलों में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषियों की समय से पहले रिहाई के सभी मामलों पर एक अगस्त, 2018 की नीति के अनुसार विचार किया जाएगा।”
उसने कहा था, “एक अगस्त, 2018 की नीति स्पष्ट करती है कि आजीवन कारावास की सजा काट रहे लोगों को कोई आवेदन जमा करने की आवश्यकता नहीं है। उम्रकैद की सजा काट रहे प्रत्येक कैदी की पात्रता के साथ अधिकारियों द्वारा समय से पहले रिहाई की प्रक्रिया पर विचार किया जाएगा।”
पीठ ने वृद्ध और अशक्त कैदियों के प्रति नरम रुख अपनाते हुए कहा था कि 70 साल से ज्यादा आयु और लाइलाज बीमारी से पीड़ित आजीवन कारावास की सजा पाए पात्र कैदियों के मामले को प्राथमिकता के आधार पर लिया जाएगा और दो महीने के भीतर निपटाया जाएगा।
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