देश की खबरें | दिलीप दोशी: एक जोशीला खिलाड़ी जिसे और सम्मान मिलना चाहिए था

नयी दिल्ली, 24 जून दिलीप दोशी 1960 के दशक के आखिर में भारतीय विश्वविद्यालय सर्किट में बल्लेबाजों के लिए आतंक का पर्याय हुआ करते थे जब उनके कलकत्ता विश्वविद्यालय और बाद में बंगाल रणजी टीम के उनके साथी स्वर्गीय गोपाल बोस ने उनसे पूछा था कि क्या वह गैरी सोबर्स को आउट कर सकते हैं।

दोशी हमेशा की तरह बेपरवाह थे और उन्होंने जवाब दिया, ‘‘हां, मैं कर सकता हूं।’’

दोशी ने इसके कुछ साल बाद विश्व एकादश मैच में सोबर्स को आउट किया लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह काउंटी क्रिकेट में नॉटिंघमशर की ओर से कई सत्र वेस्टइंडीज के इस दिग्गज के साथ खेले।

वर्ष 1991 में जब दोशी की आत्मकथा ‘स्पिन पंच’ प्रकाशित हुई तो सर गैरी सोबर्स ने ही इसकी प्रस्तावना लिखी थी, ‘‘दिलीप दोशी के पास उन लोगों को देने के लिए अपार ज्ञान है जो पेशेवर क्रिकेट में उनके रास्ते पर चलना चाहते हैं। उन्होंने दुनिया भर में सभी स्तर पर खेला है और स्पिन गेंदबाजी की कला के बारे में बात करने के लिए उनसे अधिक योग्य कोई नहीं हो सकता।’’

महानतम खिलाड़ियों में शामिल सोबर्स ने दोशी की जमकर सराहना की लेकिन भारतीय क्रिकेट के कई रहस्यों की तरह कोई भी यह नहीं समझ सका कि बीसीसीआई ने कभी उनकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल क्यों नहीं किया।

असंभव शब्द दोशी के शब्दकोष में नहीं था, वरना 70 के दशक के अंत में वह पद्माकर शिवालकर और राजिंदर गोयल को पछाड़ 32 साल की उम्र में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण नहीं कर पाते। उन्होंने अधिकतर सपाट पिचों पर खेलते हुए 100 से अधिक टेस्ट विकेट लिए।

दोशी को भारतीय पिचों पर काफी सफलता मिली लेकिन यह 1980-81 में ऑस्ट्रेलिया का दौरा था जहां उन्होंने स्पिन गेंदबाजी की प्रतिकूल पिचों पर 150 से अधिक ओवर में 11 विकेट (एडीलेड में छह और मेलबर्न में पांच) चटकाए। उनके शिकार में ग्रेग चैपल, डग वॉल्टर्स, रॉड मार्श, किम ह्यूजस जैसे बल्लेबाज शामिल थे।

उनकी गेंदबाजी महान बिशन सिंह बेदी की तरह गतिशील कविता नहीं थी और ना ही शिवालकर जैसी सटीक। दोशी इन दोनों के बीच में कहीं थे। वह गेंद को फ्लाइट कर सकते थे और लूप के साथ गेंदबाजी करते थे। वह गेंद को लगातार एक ही ही लेंथ पर पिच कर सकते थे जिससे बल्लेबाज के मन में संदेह पैदा होता था कि गेंद कितनी मुड़ेगी या सीधी होगी या कोण के साथ अंदर जाएगी।

बंगाल क्रिकेट के हलकों में उन्हें ‘दिलीप दा’ के नाम से जाना जाता था। वह निरंतरता में विश्वास करते थे- चाहे एक ही लेंथ पर अनगिनत गेंदें पिच करना हो या 50 वर्षों तक रोलिंग स्टोन्स सुनना हो और लगभग पांच दशक तक मिक जैगर के सबसे करीबी दोस्तों में से एक होना हो।

दोशी हालांकि बल्लेबाजी और क्षेत्ररक्षण के मामले में काफी पीछे थे इसलिए जब फॉर्म में थोड़ी गिरावट आती तो उस समय का टीम प्रबंधन जानता था कि किसे बाहर करना है।

यह 1982-83 में पाकिस्तान का दौरा था जहां जावेद मियांदाद ने उनका मजाक उड़ाया था।

सुनील गावस्कर अक्सर याद करते थे कि कैसे मियांदाद अपनी हिंदी-उर्दू में दोशी पर छींटाकशी करते थे।

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