देश की खबरें | दिल्ली उच्च न्यायालय ने शक्तिभोग कंपनी से जुड़े धनशोधन मामले में लेखा परीक्षक को जमानत दी
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने शक्तिभोग फूड्स लिमिटेड के खिलाफ 3,269 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता से संबंधित धन शोधन मामले की जांच के सिलसिले में एक लेखा परीक्षक (ऑडिटर) को बुधवार को जमानत दे दी।
नयी दिल्ली, आठ फरवरी दिल्ली उच्च न्यायालय ने शक्तिभोग फूड्स लिमिटेड के खिलाफ 3,269 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता से संबंधित धन शोधन मामले की जांच के सिलसिले में एक लेखा परीक्षक (ऑडिटर) को बुधवार को जमानत दे दी।
न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने रमण भूरारिया को जमानत दी, जिन्हें अगस्त 2021 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने कहा कि उनकी रिहाई के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है और मुकदमे से पहले कारावास में रखे जाना उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करेगा तथा यह न्याय का उपहास होगा।
न्यायाधीश ने कहा कि जब तक जांच समाप्त नहीं हो जाती, तब तक मुकदमा आगे नहीं बढ़ सकता है या आरोप तय नहीं किए जा सकते हैं तथा याचिकाकर्ता को लंबे समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है।
अदालत ने कहा, ‘‘ईडी ने अब तक 109 गवाहों को सूचीबद्ध किया है। जांच पूरी किए बिना, न तो कोई आरोप तय किया जा सकता है और न ही सुनवाई शुरू हो सकती है...अगर यह अदालत मुकदमे से पहले कैद में रखे रहने की अनुमति देती है, तो यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करने के साथ-साथ न्याय का उपहास करने जैसा होगा।’’
अदालत ने आरोपी को 50,000 रुपये के निजी मुचलका भरने और इतनी ही जमानत राशि जमा करने को कहा। साथ ही, देश छोड़कर नहीं जाने और जांच में शामिल होने जैसी कुछ शर्तों भी लगाई हैं। ईडी ने इस आधार पर जमानत याचिका का विरोध किया था कि आरोपी मामले में ‘‘मास्टरमाइंड’’ था।
ईडी द्वारा शक्तिभोग फूड्स लिमिटेड के खिलाफ धन शोधन का मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की एक प्राथमिकी पर आधारित है, जिसमें भूरारिया और अन्य पर आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया था।
भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) द्वारा कंपनी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के बाद कंपनी और उसके प्रवर्तकों के खिलाफ सीबीआई ने प्राथमिकी दर्ज की थी। एसबीआई के अनुसार, निदेशकों ने कथित रूप से फर्जी बैंक खातों और जाली दस्तावेजों के जरिए सार्वजनिक धन का गबन किया।
आटा, चावल और बिस्कुट जैसी सामग्री बेचने वाली कंपनी ने खाद्य उत्पाद संबंधी कई क्षेत्रों में कदम रखा था। वर्ष 2008 में कंपनी का व्यापार 1,411 करोड़ रुपये का था, जो बढ़कर 2014 में 6,000 करोड़ रुपये का हो गया।
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