देहरादून, आठ छह वर्षीय मोहम्मद अकदस जन्म से ही बधिर था जिससे उसकी बोलने क्षमता भी प्रभावित हुई। दो साल के इलाज और बाद में ‘कॉकलीयर इम्प्लांट’ के बाद जब उसने पहली बार अपनी मां को ‘अम्मी’ कहा तो वह रो पड़ीं।
अकदस उन विशेष जरूरत वाले 531 बच्चों में शामिल है जिन्हें राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान (एनआईईपीवीडी) के शीघ्र हस्तक्षेप केंद्र (ईआईसी) में वास्तविक दुनिया के लिए तैयार किया जा रहा है। यह केंद्र दिव्यांगता की वजह से आने वाली चुनौतियों को पार पाने में बच्चों की मदद करता है।
अकदस की मां निकहत परवीन ने बताया कि वह सुनने में मदद करने वाले उपकरण को महसूस करने के लिए बार-बार अपने कान को छूता रहता है। उन्होंने कहा, “ उसे अभी इसकी आदत पड़ रही है।”
अकदस की हाल में सर्जरी हुई थी और पिछले एक महीने से उसे आवाजें सुनाई देने लगी हैं। अभी उसकी काउंसलिंग और प्रशिक्षण चल रहा है।
परवीन ने कहा, “ जब उसने मुझे अम्मी बुलाया तो मैं रो पड़ी। यह पहला शब्द था जो उसने कहा था।’’
परवीन ने कहा कि उनका बेटा सुन और बोल सके, इसके लिए उन्होंने दो साल तक संघर्ष किया और अपने परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों के खिलाफ गईं।
उन्होंने कहा, “ मुझे मेरे रिश्तेदारों ने कहा था कि वह (अकदस) इस तरह ही पैदा हुआ है और मुझे इसे स्वीकार करना चाहिए। लेकिन मैं उसे जिंदगी में एक मौका देना चाहती थी।”
परवीन ने अपने बेटे के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ने का संकल्प लिया और दो साल पहले उत्तर प्रदेश से अपना गांव छोड़कर देहरादून आ गईं।
उन्होंने कहा कि परेशानियों से भरे दो साल के बाद आखिरकार अकदस अब सुन सकता है।
एनआईईपीवीडी में विशेष शिक्षक और प्रशिक्षक गायत्री एस ने कहा कि संस्थान में दो प्रकार के प्रशिक्षण प्रदान किए जाते हैं - एक व्यक्तिगत शैक्षिक कार्यक्रम और एक समूह चिकित्सा।
उन्होंने पीटीआई- से कहा, “ समूह उपचार में हम बच्चों को नियमित स्कूल के अनुकूल बनने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। इसलिए जब हम एक समूह में बैठते हैं, तो हम उसी तरह के नियमों का पालन करते हैं जैसे सभी करते हैं। तो यह एक कक्षा जैसी व्यवस्था है। ”
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