जरुरी जानकारी | कपास पर आयात शुल्क छूट को 31 दिसंबर तक बढ़ाने के बारे में जल्द फैसला करें अधिकारी : गोयल

नयी दिल्ली, 30 मई मौजूदा सत्र में कपास और धागे की कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि के बीच केंद्रीय कपड़ा और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे कपास पर आयात शुल्क छूट को 31 दिसंबर तक विस्तार देने के मामले को जल्द अंतिम रूप दें।

सरकार ने पिछले महीने जनहित में कपास की कीमतों का नीचे लाने के लिए 30 सितंबर तक इसके आयात पर सीमा शुल्क की छूट की घोषणा की थी।

मंत्री ने कपास की वर्तमान आपूर्ति बढ़ाने और उत्पादकता को मजबूत करने से संबंधित मुद्दों को हल करने के लिए रविवार को मुंबई में नवगठित कपड़ा सलाहकार समूह के साथ एक बैठक की।

मौजूदा जरूरत को पूरा करने के लिए मंत्री ने स्टॉक की उपलब्धता वाले गंतव्यों से आयात को सुविधाजनक बनाने और प्रक्रियाओं से जुड़ी आवश्यताओं को सुगम करने को कहा है।

एक सरकारी बयान में कहा गया है, ‘‘कपड़ा सचिव उपेंद्र प्रसाद सिंह ने उद्योग को सलाह दी है कि वह कुछ गंतव्यों से आयात के लिए प्रक्रिया से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने को कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय से संपर्क करे।’’

इसमें कहा गया, '‘आयात शुल्क में छूट की अवधि 31 दिसंबर, 2022 तक बढ़ाने के संबंध में गोयल ने संबंधित अधिकारियों को मामले को जल्द अंतिम रूप देने का निर्देश दिया।’’

कपड़ा सलाहकार समूह के अध्यक्ष सुरेश कोटक ने विशेष रूप से नई जल्दी परिपक्व होने वाली किस्मों की बुवाई के लिए बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने और उत्पादकता बढ़ाने के लिए बीज प्रणाली में सुधार करने की जरूरत पर बल दिया।

कपास की कीमतों में तेज वृद्धि और धागे और कपड़ों की कीमतों पर इसका असर सूती कपड़ा मूल्य श्रृंखला की संभावित वृद्धि को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।

केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) ने कपास के आयात के लिए सीमा शुल्क और कृषि अवसंरचना विकास उपकर से छूट को अधिसूचित किया था।

अधिसूचना 14 अप्रैल, 2022 से प्रभावी हुई और 30 सितंबर, 2022 तक लागू रहेगी।

उद्योग कच्चे कपास पर पांच प्रतिशत मूल सीमा शुल्क (बीसीडी) और पांच प्रतिशत कृषि अवसंरचना और विकास उपकर (एआईडीसी) हटाने की मांग कर रहा है।

बैठक को संबोधित करते हुए गोयल ने कहा कि उत्पादकता को प्रभावित करने वाले कारकों से समयबद्ध तरीके से निपटने की जरूरत है और उद्योग को इसमें स्व-नियामकीय भाव के साथ भाग लेना चाहिए।

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