देश की खबरें | ‘‘डाली कम्स टू इंडिया’’ : अतियथार्थवादी और सपनों की दुनिया से साक्षात्कार
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. (फोटो के साथ)
(फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, 21 फरवरी तस्वीर के जरिए कहानी कहने की अपनी विशिष्ट शैली के लिए मशहूर स्पेन के महान चित्रकार सल्वाडोर डाली कला के क्षेत्र में अनूठे प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं।
कहते हैं कि यूनान के एक पौराणिक चरित्र ‘मेडुसा’ के भयानक सर्पीले घुंघराले बालों को वास्तविकता का रंग देने के लिए उन्होंने एक मृत ऑक्टोपस को तेजाब में डुबोने के बाद एक तांबे की प्लेट पर रख दिया था।
इस चित्रकार की यही खासियत उन्हें सबसे अलग करती थी, जहां वह वास्तविकता और विचित्रता के मेल से एक अभिनव प्रयोग वाली कृति का निर्माण करते थे।
‘ब्रूनो आर्ट ग्रुप’ की भारत में उनके पहले कार्यक्रम की ‘क्यूरेटर’ क्रिस्टीन आर्गिलेट कहती हैं कि चित्रकार को अतियथार्थवादी कला की ‘पैरानॉयड क्रिटिकल’ (विशेष मनोवैज्ञानिक) पद्धति विकसित करने का श्रेय दिया जाता है। यह पद्धति जितनी आकर्षक थी, उतनी ही अप्रत्याशित भी थी।
‘‘डाली कम्स टू इंडिया’’ प्रदर्शनी सबसे पहले ‘इंडिया हैबिटेट सेंटर’ में ‘विजुअल आर्ट गैलरी’ में 7-13 फरवरी को आयोजित की गई थी। प्रदर्शनी में डाली की लगभग 200 कृतियां शामिल थीं, जिसमें भारत की तस्वीरों से प्रेरित उनकी ‘‘हिप्पीज’’ श्रृंखला भी शामिल थी।
‘‘हिप्पीज’’ डाली की ऐसी श्रृंखला है जो सीधी, आड़ी तिरछी रेखाओं, धूसर रंगों और सपनीली दुनिया जैसी आकृतियों में मानो जान फूंक देती है और सोचने पर मजबूर करती है कि यह निश्चित ही किसी प्रतिभाशाली दिमाग का काम है।
‘ब्रूनो आर्ट ग्रुप’ द्वारा ‘मसर्रत’ में वर्तमान में प्रदर्शित संग्रह में 1960 के दशक के मध्य से लेकर 1970 के दशक की शुरुआत तक की उनकी कृतियां शामिल हैं। यह एक ऐसा दौर था जब डाली ने एचिंग पर बड़े पैमाने पर काम किया, और पौराणिक आकृतियों एवं ईसाइयत की गहरी कंदराओं में विचरते हुए उनके अनोखे अर्थों के साथ विचित्र शैली में उन्हें अभिव्यक्त किया।
एचिंग, धातु में बनी आकृति में एक डिजाइन तैयार करने के लिए किसी धातु की सतह के चुनिंदा हिस्सों की कटाई के लिए तीव्र एसिड या मॉरडेंट का इस्तेमाल करने की प्रक्रिया को कहते हैं।
आर्गिलेट ने ‘पीटीआई-’ से बातचीत में कहा, ‘‘डाली शुरू में एक ऐसे व्यक्ति थे जो काम के प्रति बहुत समर्पित थे। वह बहुत अनुशासित तरीके से काम करते थे। सुबह छह बजे से शाम पांच-छह बजे तक और फिर वह लोगों से मिलते थे। 1965 तक, उन्होंने बहुत ही सधे तरीके से काम किया, बहुत अच्छी तरह से सोचा, प्रतिबिंबित किया।’’
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)