देश की खबरें | भ्रष्टाचार मुक्त समाज के लिए अदालतों को रिहाई से इनकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए : न्यायालय
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भ्रष्टाचार मुक्त समाज के लिए अदालतों को अभियुक्तों की रिहाई से इनकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
नयी दिल्ली, छह मार्च उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भ्रष्टाचार मुक्त समाज के लिए अदालतों को अभियुक्तों की रिहाई से इनकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने भ्रष्टाचार के एक मामले में एक सरकारी अधिकारी की अग्रिम जमानत खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा। न्यायालय ने इस बात पर अफसोस जताया कि भ्रष्टाचार में “बहुत खतरनाक आशंकाएं” हैं।
शीर्ष अदालत पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ एक लोक सेवक की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उसे राहत देने से इनकार कर दिया गया था।
उच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 के प्रावधानों के तहत पटियाला में उसके खिलाफ दर्ज मामले में उसकी अग्रिम जमानत खारिज कर दी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि आरोपी पर एक ग्राम पंचायत में विकास कार्यों के ऑडिट के लिए रिश्वत मांगने का आरोप है।
पीठ ने तीन मार्च के अपने आदेश में कहा, “यदि भ्रष्टाचार की भयावहता के बारे में जनता द्वारा जो कुछ कहा जाता है, उसका एक अंश भी सत्य है, तो यह सत्य से बहुत दूर नहीं होगा कि उच्च पदस्थ व्यक्तियों द्वारा दंडाभाव में किए जा रहे व्यापक भ्रष्टाचार के कारण ही इस देश में आर्थिक अशांति पैदा हुई है।”
इसमें कहा गया है कि यदि किसी से पूछा जाए कि हमारे समाज की समृद्धि की ओर प्रगति में बाधा डालने वाला एकमात्र कारक क्या है, तो वह भ्रष्टाचार है।
न्यायालय ने कहा कि “सरकार और राजनीतिक दलों के उच्च स्तरों पर बैठे भ्रष्ट तत्वों” का खतरा, विकासशील देश के समाज में कानून और व्यवस्था पर हमला करने वाले किराए के हत्यारों से भी कहीं अधिक है।
उसने कहा कि निर्दोष होने की धारणा ही अग्रिम जमानत देने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती।
पीठ ने कहा कि निर्दोष होने की धारणा एक ऐसा कारक है जिस पर अदालत को अग्रिम जमानत की याचिका पर विचार करते समय ध्यान देने की आवश्यकता है, लेकिन उचित नियम यह है कि आरोपी के पक्ष और सार्वजनिक न्याय के पक्ष के बीच संतुलन बनाया जाए।
पीठ ने कहा, “यदि भ्रष्टाचार मुक्त समाज सुनिश्चित करने के लिए किसी आरोपी को स्वतंत्रता से वंचित किया जाना है, तो अदालतों को ऐसी स्वतंत्रता से इनकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए।”
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