देश की खबरें | अदालतें आरोपपत्र दाखिल नहीं करने पर ‘डिफॉल्ट’ जमानत संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई कर सकती हैं
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि निचली अदालतें और उच्च न्यायालय 60 या 90 दिनों की निर्धारित अवधि के भीतर आरोप पत्र दाखिल नहीं करने के आधार पर आपराधिक मामलों में ‘डिफॉल्ट’ जमानत याचिकाओं पर विचार कर सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि उन्हें मामले में रितु छाबड़िया के हाल के फैसले पर भरोसा करने की जरूरत नहीं है।
नयी दिल्ली, 12 मई उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि निचली अदालतें और उच्च न्यायालय 60 या 90 दिनों की निर्धारित अवधि के भीतर आरोप पत्र दाखिल नहीं करने के आधार पर आपराधिक मामलों में ‘डिफॉल्ट’ जमानत याचिकाओं पर विचार कर सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि उन्हें मामले में रितु छाबड़िया के हाल के फैसले पर भरोसा करने की जरूरत नहीं है।
दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 167 के अनुसार, यदि जांच एजेंसी रिमांड की तारीख से 60 दिनों के भीतर आरोप पत्र दाखिल करने में विफल रहती है तो एक आरोपी ‘डिफॉल्ट’ जमानत का हकदार होगा। कुछ श्रेणी के अपराधों के लिए, निर्धारित अवधि को 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।
प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला की पीठ ने यह टिप्पणी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की उस अपील पर सुनवाई करते हुए की जिसमें रितु छाबड़िया मामले में फैसले को वापस लेने का अनुरोध किया गया है।
उच्चतम न्यायालय की एक अन्य पीठ ने 26 अप्रैल को रितु छाबड़िया मामले में कहा था कि जांच एजेंसी को किसी आरोपी को उसे मिलने वाली स्वत: जमानत (डिफॉल्ट बेल) से वंचित करने के लिए जांच पूरी किये बिना अदालत में आरोप पत्र दाखिल नहीं करना चाहिए।
न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति सी. टी. रविकुमार की पीठ ने कहा था कि ‘डिफॉल्ट’ जमानत का अधिकार केवल एक वैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि एक मौलिक अधिकार है जो अनुच्छेद 21 के तहत मिलता है।
प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने एक मई को दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था, ‘‘इस बीच संबंधित फैसले के आधार पर किसी अन्य अदालत के समक्ष दायर अन्य अर्जियों को चार मई, 2023 के बाद के लिए स्थगित कर दिया जायेगा।’’
बाद में, अदालत ने रितु छाबड़िया फैसले के कार्यान्वयन पर रोक को 12 मई तक बढ़ा दिया था।
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