देश की खबरें | न्यायालय 1920 के अधिनियम से एएमयू का सांप्रदायिक चरित्र खत्म होने की पड़ताल करेगा

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे पर बढ़ते विवाद पर उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वह इस बात की पड़ताल करेगा कि क्या जब इसे 1920 एएमयू अधिनियम के तहत एक विश्वविद्यालय के रूप में नामित किया गया था तब संस्थान का “सांप्रदायिक चरित्र” खत्म हो गया था।

नयी दिल्ली, 23 जनवरी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे पर बढ़ते विवाद पर उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वह इस बात की पड़ताल करेगा कि क्या जब इसे 1920 एएमयू अधिनियम के तहत एक विश्वविद्यालय के रूप में नामित किया गया था तब संस्थान का “सांप्रदायिक चरित्र” खत्म हो गया था।

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने पूछा कि क्या अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) अधिनियम, 1920 के तहत धार्मिक अल्पसंख्यकों द्वारा शासित संस्थान के रूप में इसकी स्थिति को रद्द करने का परिणाम है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल इस तथ्य से कि इसे एक विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है, इसका मतलब यह नहीं है कि यह अपने अल्पसंख्यक दर्जे को छोड़ देगा।

पीठ ने कहा, “संकेत क्या हैं (विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जा खोने के संकेत)? बाद में हम इसे फिर से देखेंगे ताकि यह पता चल सके कि जब इसे विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया था, तो इसने अपना अल्पसंख्यक दर्जा छोड़ दिया था। केवल यह तथ्य कि इसे विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया था, अल्पसंख्यक दर्जे का समर्पण नहीं है।”

पीठ में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला, न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा भी शामिल हैं।

प्रधान न्यायाधीश ने जिरह के चौथे दिन के दौरान कहा, “हमें स्वतंत्र रूप से देखना होगा कि क्या 1920 के अधिनियम से एएमयू का सांप्रदायिक चरित्र खो गया था।”

पीठ ने कहा कि यह एक स्थापित सिद्धांत है कि जब कोई संस्था सहायता मांगती है तो उसे अपना अल्पसंख्यक दर्जा नहीं छोड़ना पड़ता है।

अदालत ने कहा, “क्योंकि आज यह मान्यता है कि सहायता के बिना कोई भी संस्था, चाहे अल्पसंख्यक हो या गैर-अल्पसंख्यक, अस्तित्व में नहीं रह सकती। केवल सहायता मांगने या सहायता दिए जाने से आप अपने अल्पसंख्यक दर्जे का दावा करने का अधिकार नहीं खो देते हैं। यह अब बहुत अच्छी तरह से तय हो गया है।”

दिन भर चली सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से 1920 के कानून के तहत और संविधान को अपनाने की पूर्व संध्या पर एएमयू की स्थिति के बारे में पूछा।

सीजेआई ने पूछा, “1920 और 25 जनवरी 1950 के बीच क्या हुआ?”

मेहता ने जवाब दिया, “मेरा तत्काल जवाब है, 1920 और संविधान लागू होने के बीच, अधिनियम में कोई बदलाव नहीं हुआ है। 1920 (अधिनियम) वैसे ही बना हुआ है। पहला संशोधन 1951 में आया है।”

साल 1920 का अधिनियम अलीगढ़ में एक शिक्षण और आवासीय मुस्लिम विश्वविद्यालय को शामिल करने की बात करता है। 1951 में, विश्वविद्यालय द्वारा मुस्लिम छात्रों को प्रदान की जाने वाली अनिवार्य धार्मिक शिक्षा को समाप्त करने के लिए एएमयू अधिनियम में संशोधन किया गया था।

पीठ ने सरकार के विधि अधिकारी से पूछा, “क्या 1920 का कानून भी एएमयू के पहले से मौजूद इतिहास को मान्यता देने के अनुरूप है... या क्या 1920 का कानून ही अल्पसंख्यक दर्जे के किसी भी दावे को रद्द कर देता है?”

मेहता ने अपनी लिखित दलीलों का जिक्र करते हुए कहा कि 1920 में अपनी स्थापना के समय विश्वविद्यालय का चरित्र मुख्य रूप से राष्ट्रीय और गैर-अल्पसंख्यक था।

पीठ ने दिन के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी की दलीलें भी सुनीं। एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे के पक्ष में अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने दलीलें दीं।

इस मामले में सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।

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