सुप्रीम कोर्ट ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल कानून के प्रावधान पर केंद्र से मांगा जवाब

उच्चतम न्यायालय ने आत्महत्या के प्रयास को दंडनीय अपराध के दायरे से लगभग बाहर करने संबंधी मानसिक स्वास्थ्य देखभाल कानून, 2017 के प्रावधान पर शुक्रवार को केन्द्र से जवाब मांगा.

सुप्रीम कोर्ट (Photo Credits: PTI/File Image)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने आत्महत्या के प्रयास को दंडनीय अपराध के दायरे से लगभग बाहर करने संबंधी मानसिक स्वास्थ्य देखभाल कानून, 2017 के प्रावधान पर शुक्रवार को केन्द्र से जवाब मांगा. शीर्ष अदालत ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल कानून और भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों में अंतर का जिक्र करते हुये कहा कि पुराना कानून आत्महत्या के प्रयास को दंडनीय अपराध बनाता है जबकि नया कानून ऐसे कदम की वजह घोर तनाव मानता है.

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमणियन की पीठ ने इस सवाल पर केन्द्र से जवाब मांगने के साथ ही अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल को नोटिस जारी किया है. पीठ एक गैर सरकारी संगठन की याचिका पर विचार के लिये तैयार हो गयी है. इस याचिका में देश के चिड़ियाघरों में पशुओं के बाड़े में कूद कर आत्महत्या के प्रयासों की रोकथाम सुनिश्चित करने के लिये केन्द्र और केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण को निर्देश देने का अनुरोध किया गया है.

पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘अटार्नी जनरल को नोटिस जारी किया जाये और केन्द्र सरकार से मानसिक स्वास्थ्य देखभाल कानून, 2017 की धारा 115 की वैधता को न्यायोचित ठहराने के लिये कहा जाए जिसने भारतीय दंड संहिता की धारा 309 को लगभग निष्प्रभावी कर दिया है.’’

सालिसीटर जनरल तुषार मेहता ने केन्द्र की ओर से नोटिस स्वीकार किया. पीठ ने कहा कि आत्महत्या के प्रयास का कदम भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत दंडनीय अपराध है लेकिन मानसिक स्वास्थ्य देखभाल कानून, 2017 की धारा 115 का इस प्रावधान पर प्रभाव है.

न्यायालय ने अतिरिक्त सालिसीटर जनरल एएनएस नाडकर्णी को इस मामले में न्याय मित्र नियुक्त किया और इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 309 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका के साथ संलग्न कर दिया.

सुनवाई के दौरान पीठ ने सालिसीटर जनरल से जानना चाहा कि एक कानून बनाते समय सरकार कैसे भारतीय दंड संहिता के एक प्रावधान को लगभग निष्प्रभावी बना देगी. मेहता ने कहा कि जब कोई व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करता है तो यही माना जाता है कि उसका चित्त विकृत है या उसे कोई मानसिक रोग है.

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि हमेशा ही यह विकृत चित्त का मामला नहीं हो सकता जैसा कि वियतनाम में विरोध प्रकट करने के लिये भिक्षुओं द्वारा खुद का जीवन खत्म करने की घटना में हुआ.

पीठ ने कहा कि वे शांत चित्त के थे. उनमें विकृत चित्त का कोई मामला नहीं था. पीठ ने जैन समुदाय में प्रचलित संथारा प्रथा का जिक्र किया और कहा कि यह आत्महत्या करना नहीं है बल्कि सांसारिक जीवन से स्वंय को मुक्त करना है.

इससे पहले, सुनवाई शुरू होते ही गैर सरकारी संगठन ‘रेड लिंक्स कंफेडरेशन’ की ओर से पशुप्रेमी संगीता डोगरा ने कहा कि एक व्यक्ति आत्महत्या के इरादे से पशुओं के बाड़े में कूद गया और उसने इस तरह से एक हाथी को खयंत्रणा पहुंचाई.

उन्होंने केन्द्र और केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया कि लोगों को आत्महत्या का प्रयास करने से रोकने के लिये आवश्यक कदम उठाये जायें. दिल्ली उच्च न्यायालय ने आठ जुलाई को इस गैर सरकारी संगठन की याचिका पर विचार करने से इंकार कर दिया था. इस याचिका में देश के विभिन्न चिड़ियाघरों में पशुओं के बाड़े में लोगों को कूदने की घटनाओं के बावजूद इनकी रोकथाम के मामले में केन्द्र पर निष्क्रियता का आरोप लगाया गया था.

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