देश की खबरें | न्यायालय ने अचेतावस्था में पड़े युवक के लिए इच्छामृत्यु से जुड़ी याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक दंपति की याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा, जिनका 30 वर्षीय बेटा सिर में चोट लगने के बाद 2013 से अस्पताल में अचेतास्था (वेजिटेटिव स्टेट) में है।
नयी दिल्ली, 20 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक दंपति की याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा, जिनका 30 वर्षीय बेटा सिर में चोट लगने के बाद 2013 से अस्पताल में अचेतास्था (वेजिटेटिव स्टेट) में है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेंसिया) की अनुमति देने के बजाय वह मरीज को उपचार और देखभाल के लिए सरकारी अस्पताल या इसी तरह के स्थान पर स्थानांतरित करने की संभावना तलाशेगी।
शीर्ष अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निष्कर्षों से सहमति जताई, जिसने माता-पिता की इस याचिका पर विचार करने के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने से इनकार कर दिया था कि उनके बेटे को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु के तहत जीवन रक्षक प्रणाली हटाकर या उपचार बंद कर किसी मरीज को मरने दिया जाता है।
प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि मरीज हरीश राणा को जीवन बचाने के लिए वेंटिलेटर पर नहीं रखा गया या अन्य यांत्रिक सहायता नहीं दी जा रही है, बल्कि उसे भोजन नली के जरिए खाना दिया जा रहा, इसलिए उसे उसकी हालत पर छोड़ देना ठीक नहीं होगा।
अदालत ने इस तथ्य पर भी विचार किया कि एक इमारत की चौथी मंजिल से गिरने के बाद से मरीज 11 वर्षों से अचेतावस्था में है तथा उसके वृद्ध माता-पिता को उपचार के माध्यम से जीवन निर्वाह करना कठिन हो रहा है, क्योंकि उन्होंने अपना मकान भी बेच दिया है।
पीठ ने कहा कि राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने के लिये मेडिकल बोर्ड गठित करने की माता-पिता की याचिका को उच्च न्यायालय ने सही रूप से खारिज किया, क्योंकि कोई भी चिकित्सा पेशेवर किसी ऐसे मरीज को कोई पदार्थ देकर मौत का कारण नहीं बनेगा, जो बिना किसी यांत्रिक या वेंटिलेटर सहायता के जीवित है।
पीठ ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय ने इस तथ्य पर भी विचार किया कि मरीज के माता-पिता अब वृद्ध हो चुके हैं और इतने साल से बिस्तर पर पड़े अपने बेटे की देखभाल नहीं कर सकते और क्या उसे अपनी हालत छोड़ देने के अलावा कोई मानवीय समाधान मिल सकता है।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘इसलिए, हम केंद्र को नोटिस जारी करते हैं और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी से हमारी सहायता करने का आग्रह करते हैं। हम देखेंगे कि क्या उसे कहीं और रखा जा सकता है। यह बहुत कठिन मामला है।’’
बाद में, पीठ ने एक अन्य मामले में अदालत में उपस्थित भाटी से पूछा कि क्या राणा को किसी अस्पताल में भर्ती कराने की कोई संभावना है, जहां उसकी देखभाल की जा सके। विधि अधिकारी ने कहा, ‘‘मैं इस पर गौर करूंगी। मैं इस बारे में पता करूंगी और अदालत की सहायता करूंगी।’’
जुलाई में उच्च न्यायालय ने राणा के मामले को मेडिकल बोर्ड को भेजने से इनकार कर दिया था। याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता (करीब 30 साल का) पंजाब विश्वविद्यालय का छात्र था और 2013 में अपने पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उसके सिर में चोटें आई थीं। याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता के परिवार ने उसका इलाज करने की पूरी कोशिश की है, लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।
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