देश की खबरें | कावेरी नदी से 24 हजार क्यूसेक पानी छोड़ने की तमिलनाडु की याचिका पर आदेश देने से न्यायालय का इनकार
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने खड़ी फसलों की सिंचाई के लिए कर्नाटक से प्रतिदिन 24,000 क्यूसेक कावेरी नदी का जल छोड़े जाने संबंधी तमिलनाडु सरकार की याचिका पर कोई आदेश देने से शुक्रवार को इनकार कर दिया।
नयी दिल्ली, 25 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने खड़ी फसलों की सिंचाई के लिए कर्नाटक से प्रतिदिन 24,000 क्यूसेक कावेरी नदी का जल छोड़े जाने संबंधी तमिलनाडु सरकार की याचिका पर कोई आदेश देने से शुक्रवार को इनकार कर दिया।
न्यायमूर्ति बी. आर. गवई, न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति पी. के. मिश्रा की पीठ ने कर्नाटक द्वारा छोड़े गए पानी की मात्रा पर कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (सीडब्ल्यूएमए) से रिपोर्ट मांगी। पीठ ने ऐसा अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी द्वारा यह सूचित किए जाने के बाद किया कि प्राधिकरण की एक बैठक सोमवार को निर्धारित है।
न्यायालय ने कहा, “हमारे पास इस मामले में कोई विशेषज्ञता नहीं है। एएसजी ने बताया है कि प्राधिकरण अगले पखवाड़े के लिए पानी छोड़ने पर निर्णय लेने के वास्ते सोमवार को बैठक करने वाला है।’’
पीठ ने यह भी कहा, ‘‘हमें लगता है कि यह उचित होगा कि सीडब्ल्यूएमए इस पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे कि पानी छोड़े जाने के लिए जारी निर्देशों का पालन किया गया है या नहीं।’’
कर्नाटक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि यह राज्य सरकार के लिए एक संकटपूर्ण वर्ष रहा है, क्योंकि इस बार बारिश कम हुई है, इसलिए तमिलनाडु को कम पानी छोड़ा जाना अपरिहार्य है।
उन्होंने कहा कि सीडब्ल्यूएमए द्वारा निर्धारित पानी पहले ही छोड़ा जा चुका है, लेकिन इसे तमिलनाडु तक पहुंचने में तीन दिन लगते हैं।
तमिलनाडु की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि सीडब्ल्यूएमए के आदेशों के बावजूद निचले तटीय राज्य को पानी उपलब्ध नहीं कराया गया है।
अब इस मामले में एक सितम्बर को सुनवाई होगी।
कर्नाटक सरकार ने तमिलनाडु की याचिका को ‘पूरी तरह से गलत’ बताया है, जिसमें शीर्ष अदालत से यह निर्देश देने का आग्रह किया गया है कि उसे खड़ी फसलों की सिंचाई के लिए प्रतिदिन कावेरी नदी का 24,000 क्यूसेक जल छोड़ने के लिए कहा जाए।
कर्नाटक सरकार ने शीर्ष अदालत में दायर एक हलफनामे में कहा है कि तमिलनाडु की याचिका इस गलत धारणा पर आधारित है कि ‘‘वर्तमान जल वर्ष एक सामान्य जल वर्ष है, न कि संकटग्रस्त जल वर्ष’’।
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