नयी दिल्ली, 24 जनवरी दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक याचिकाकर्ता से दिल्ली के शासन और प्रशासन पर कैग रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की ‘‘मांग करने के अधिकार’’ पर सवाल उठाया।
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय एवं न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने विधानमंडल में रिपोर्ट पेश करने के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 151 का संज्ञान लिया और कहा कि जनता को जानने का अधिकार है, लेकिन यह संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं हो सकता।
अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 151 एक ‘‘आवश्यकता’’ है और वर्तमान मामला ‘‘महत्वपूर्ण’’ है, क्योंकि ‘‘कुछ जानने की कोशिश कर रहे नागरिकों को संवैधानिक प्रावधान का सामना करना पड़ रहा है।’’
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि नागरिकों को सूचना का अधिकार अधिनियम एवं संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत ‘‘जानने का अधिकार’’ है।
उन्होंने दिल्ली के मतदाताओं के इस अधिकार पर जोर दिया कि उन्हें पांच फरवरी को राजधानी में होने वाले मतदान से पहले रिपोर्ट की विषय-वस्तु जानने का अधिकार है।
पीठ ने हालांकि वरिष्ठ वकील से कहा कि वे ‘‘सामान्य तर्क’’ न दें, बल्कि वह कानूनी प्रावधान दिखाएं जिसके आधार पर ऑडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का अनुरोध किया गया।
पीठ ने कहा, ‘‘जनता को जानने का अधिकार है, लेकिन किसी संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। यदि अनुरोध स्वीकार कर लिया जाता है, तो अनुच्छेद 151 का उल्लंघन होगा।’’
वरिष्ठ अधिवक्ता ने रिपोर्ट पेश करने के लिए विधानसभा की बैठक बुलाने की याचिका को खारिज करने वाले एकल न्यायाधीश के फैसले का अध्ययन करने के लिए 27 जनवरी तक का समय मांगा।
अदालत ने कहा कि इस मामले में कई मुद्दे उठाए गए हैं, जिनमें यह भी शामिल है कि क्या कैग रिपोर्ट को आरटीआई अधिनियम के तहत पेश किए जाने से पहले ‘‘सूचना’’ माना जा सकता है। सुनवाई तीन फरवरी के लिए तय की गई है।
याचिकाकर्ता सेवानिवृत्त लोक सेवक बृज मोहन ने कहा कि दिल्ली के मतदाताओं को विधानसभा चुनाव में वोट डालने से पहले राजधानी की स्थिति और उसकी वित्तीय स्थिति के बारे में अवश्य पता होना चाहिए।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने अपनी रिपोर्ट में ‘आप’ के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार की कुछ नीतियों की आलोचना की थी, जिसमें अब रद्द कर दी गई आबकारी नीति भी शामिल है, जिसके कारण कथित तौर पर सरकारी खजाने को नुकसान हुआ था।
याचिका में दावा किया गया कि आबकारी नीति से लेकर प्रदूषण तक विभिन्न मुद्दों पर रिपोर्टों का दिल्ली में शासन पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार, उपराज्यपाल और कैग को रिपोर्ट सार्वजनिक करने का निर्देश देने का अनुरोध किया है।
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