देश की खबरें | न्यायालय ने टीवी समाचार चैनलों के लिए स्व-नियामक तंत्र को मजबूत करने का प्रस्ताव रखा

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नयी दिल्ली, 14 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को टीवी समाचार चैनलों की निगरानी के लिए मौजूदा स्व-नियामक तंत्र में कमी पाई और केंद्र से इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया मांगते हुए कहा कि वह इसे “अधिक प्रभावी” बनाना चाहता है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह मीडिया पर कोई सेंसरशिप नहीं लगाना चाहता। प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक प्रभावी स्व-नियामक तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि कुछ चैनल अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले की कवरेज के दौरान “उन्मत्त” हो गए थे।

शीर्ष अदालत ने न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) से न्यूज ब्रॉडकास्टिंग और डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ए.के. सीकरी और इसके पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) आर.वी. रवींद्रन से सुझाव लेने के लिए कहा। दोनों उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हैं। एनबीए को अब न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (एनबीडीए) के नाम से जाना जाता है, जिसके पास एक स्व-नियामक तंत्र है।

इसमें कहा गया है कि शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीशों से मिले सुझाव सहित सभी मौजूदा सामग्रियों पर ध्यान देने के बाद स्व-नियामक तंत्र को मजबूत किया जा सकता है।

शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि स्व-नियामक तंत्र के उल्लंघन के लिए टीवी समाचार चैनल पर अधिकतम जुर्माना केवल एक लाख रुपये लगाया जा सकता है, जो 2008 में तय किया गया था।

पीठ ने एसोसिएशन की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार को बताया, “हम पूरी तरह से आपके साथ हैं कि हमें सरकार द्वारा विनियमन के बारे में सावधान रहना चाहिए, क्योंकि हम मीडिया पर प्री-सेंसरशिप या पोस्ट सेंसरशिप नहीं लगाना चाहते हैं।”

पीठ में न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं।

बंबई उच्च न्यायालय की जनवरी 2021 की टिप्पणियों के खिलाफ एसोसिएशन द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा, “हम स्व-नियामक तंत्र के लिए आपकी सराहना करते हैं, लेकिन इसे प्रभावी होना चाहिए।”

उच्च न्यायालय ने कहा था कि मीडिया ट्रायल अदालत की अवमानना है और प्रेस से आग्रह किया कि वह “लक्ष्मण रेखा” को पार न करे, क्योंकि उसे कुछ समाचार चैनलों द्वारा अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले की कवरेज “अवमाननापूर्ण” लगी।

एनबीडीए की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह निजी टेलीविजन पर समाचार, समसामयिक मामलों और डिजिटल प्रसारकों का प्रतिनिधित्व करता है और भारत में समाचार, समसामयिक मामलों और डिजिटल प्रसारकों की सामूहिक आवाज है।

इसमें कहा गया है कि वर्तमान में 27 प्रमुख समाचार और समसामयिक मामलों के प्रसारक (125 समाचार और समसामयिक मामलों के चैनल) एनबीडीए के सदस्य हैं।

शीर्ष अदालत ने एसोसिएशन की याचिका पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।

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