देश की खबरें | जमानत याचिकाओं में आपराधिक पृष्ठभूमि का उल्लेख अनिवार्य करने पर विचार करें अदालतें: न्यायालय
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि देश के सभी उच्च न्यायालयों को अपने नियमों में ऐसे प्रावधान पर विचार करना चाहिए, जिससे जमानत याचिकाओं में आरोपी को अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का खुलासा करना अनिवार्य हो जाए।
नयी दिल्ली, 18 जुलाई उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि देश के सभी उच्च न्यायालयों को अपने नियमों में ऐसे प्रावधान पर विचार करना चाहिए, जिससे जमानत याचिकाओं में आरोपी को अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का खुलासा करना अनिवार्य हो जाए।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह टिप्पणी उस दौरान की जब उसने राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ की गई कठोर टिप्पणियों को हटाने का आदेश दिया।
उक्त न्यायिक अधिकारी ने हत्या के प्रयास के एक मामले में आरोपी को जमानत दी थी।
पीठ ने कहा, “हम मानते हैं कि देश के प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने नियमों और/या आपराधिक प्रक्रिया से जुड़े नियमों में ऐसा प्रावधान जोड़ने पर विचार करना चाहिए, जिससे आरोपी पर यह दायित्व आए कि वह अपनी किसी भी पूर्व आपराधिक संलिप्तता की जानकारी दे।”
बाद में, अदालत ने शिकायतकर्ता की याचिका स्वीकार करते हुए आरोपी की जमानत रद्द कर दी।
इसके बाद आरोपी ने उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी और न्यायिक अधिकारी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्होंने उसके आपराधिक रिकॉर्ड को नजरअंदाज़ करते हुए ‘बेहद अनुचित और लापरवाही भरे तरीके’ से जमानत दे दी।
न्यायिक अधिकारी द्वारा आधिकारिक दस्तावेज के रूप में दर्ज इन सख्त टिप्पणियों के खिलाफ अपील करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जमानत अर्जियों पर विचार करते समय अभियुक्तों के आपराधिक इतिहास को ध्यान में रखना देश भर की अदालतों के लिए चिंता का विषय है।
इसमें पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के नियमों और आदेशों का हवाला दिया गया है, जिसमें यह स्पष्ट प्रावधान है कि जमानत अर्जी में याचिकाकर्ता को यह उल्लेख करना होगा कि वह किसी अन्य आपराधिक मामले में शामिल था या नहीं।
पीठ ने कहा, ‘‘मौजूदा मामले में, तथ्य यह है कि उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने अपीलकर्ता-न्यायिक अधिकारी को नुकसान पहुंचाने के लिए कड़ी टिप्पणियां कीं, जबकि उन्हें स्पष्टीकरण या कारण बताने का कोई अवसर नहीं दिया गया।’’
न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा की गई कड़ी टिप्पणियों को हटाते हुए पीठ ने कहा कि वे ‘अनावश्यक’ थीं।
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