देश की खबरें | आपराधिक कानूनों की जगह लेने के लिए पेश तीन विधेयकों पर व्यापक विचार विमर्श का कांग्रेस का आह्वान

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. कांग्रेस ने रविवार को उन तीन विधेयकों पर विशेषज्ञों और आम जनता द्वारा व्यापक विचार-विमर्श का आह्वान किया, जिसका उद्देश्य भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करना है। कांग्रेस के अनुसार, ऐसे विचार विमर्श से ‘‘आपराधिक कानून के समस्त ढांचे को ध्वस्त होने’’ से बचाया जा सकता है।

नयी दिल्ली, 13 अगस्त कांग्रेस ने रविवार को उन तीन विधेयकों पर विशेषज्ञों और आम जनता द्वारा व्यापक विचार-विमर्श का आह्वान किया, जिसका उद्देश्य भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करना है। कांग्रेस के अनुसार, ऐसे विचार विमर्श से ‘‘आपराधिक कानून के समस्त ढांचे को ध्वस्त होने’’ से बचाया जा सकता है।

कांग्रेस महासचिव रणदीप सुरजेवाला ने एक बयान में कहा कि 11 अगस्त को, बिना किसी पूर्व सूचना या सार्वजनिक परामर्श अथवा कानूनी विशेषज्ञों, न्यायविदों, अपराध विज्ञानियों और अन्य हितधारकों से सुझाव आमंत्रित किए बिना, मोदी सरकार ने अपने ‘पिटारे’ से तीन विधेयक पेश किए। सुरजेवाला ने कहा कि सरकार ने ऐसा करके देश के पूरे आपराधिक कानून के ढांचे को "गुपचुप और अपारदर्शी तरीके से" पुनर्गठित किया।

कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘गृह मंत्री की शुरुआती टिप्पणी से यह तथ्य उजागर हुआ कि अमित शाह पूरी कवायद से स्वयं अनभिज्ञ थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘जनता या हितधारकों के सुझावों और समझ से दूर एक गुप्त कवायद से केवल कुछ श्रेय लिया जा सकता है, लेकिन इससे देश के आपराधिक कानून के ढांचे में सुधार के सार्वजनिक उद्देश्य को पूरा नहीं किया जा सकता।’’

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को लोकसभा में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) विधेयक, 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) विधेयक, 2023 और भारतीय साक्ष्य (बीएस) विधेयक, 2023 पेश किए। ये विधेयक क्रमश: भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), 1860, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी),1898 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की जगह लेंगे।

मंत्री ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से तीनों विधेयकों को पड़ताल के लिए गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति को भेजने का आग्रह भी किया।

सुरजेवाला ने एक विस्तृत विश्लेषण में, विधेयकों के माध्यम से किये गये परिवर्तनों पर शाह की टिप्पणी का प्रतिवाद किया और आरोप लगाया कि उन्होंने प्रस्तावित विधानों के कई बिंदुओं पर "झूठ बोला और गुमराह" किया है।

उन्होंने कहा, ‘‘भले ही विधेयकों को संसद की स्थायी समिति को भेज दिया गया है, लेकिन विधेयकों और उनके प्रावधानों को न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं, न्यायविदों, अपराध विज्ञानियों, सुधारवादियों, हितधारकों और आम जनता द्वारा व्यापक सार्वजनिक बहस के लिए खुला रखा जाना चाहिए, ताकि बिना चर्चा के पूरे आपराधिक कानूनी ढांचे को ध्वस्त करने के जाल से बचा जा सके, जो भाजपा सरकार के डीएनए में रच बस गया है।’’

उन्होंने कहा, "हमें उम्मीद है कि बेहतर समझ कायम होगी।"

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी विधेयकों पर व्यापक विचार-विमर्श का आह्वान किया है। तिवारी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा, ‘‘इनमें से कुछ अधिनियमों, विशेष रूप से सीआरपीसी में राज्य संशोधन हैं, क्योंकि कानून और व्यवस्था राज्य का विषय है। इनमें से प्रत्येक अधिनियम को लेकर पिछले सौ-डेढ सौ वर्षों में काफी मुकदमेबाजी हुई है और प्रत्येक प्रावधान की प्रिवी काउंसिल, संघीय अदालत, उच्चतम न्यायालय, विभिन्न उच्च न्यायालयों और कुछ मामलों में अधीनस्थ अदालतों द्वारा भी न्यायिक फैसलों के माध्यम से व्याख्या की गई है।’’

उन्होंने कहा कि शाह द्वारा पेश किये गये और गृह मामलों की स्थायी समिति को भेजे गये तीनों नये विधेयकों की व्याख्या करते हुए न्यायिक फैसलों के आलोक में प्रत्येक प्रावधान की गंभीरता से पड़ताल करने की जरूरत है।

तिवारी ने शनिवार को कहा, ‘‘इसलिए यह जरूरी है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा वकीलों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, पूर्व पुलिस अधिकारियों/सिविल सेवकों, न्यायविदों तथा मानव, महिलाओं और नागरिक अधिकार आंदोलनों में सक्रिय सदस्यों से युक्त संसद की एक संयुक्त समिति का गठन किया जाना चाहिए ताकि इन तीनों विधेयकों की बहुत ही गंभीरता से पड़ताल की जा सके।’’

उन्होंने कहा कि इन विधेयकों का भारत के संविधान के भाग-तीन में निहित मौलिक अधिकारों पर गंभीर प्रभाव है।

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