देश की खबरें | जेल में बंद सांसद रशीद इंजीनियर की जमानत याचिका पर सुनवाई के अधिकार क्षेत्र को लेकर उलझन
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. जम्मू कश्मीर के बारामूला से सांसद रशीद इंजीनियर के खिलाफ आतंकवाद के वित्तपोषण के एक मामले में उनकी जमानत याचिका पर कौन सुनवाई करेगा, यह सवाल अदालतों को उलझाए हुए है और यह मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंच गया है।
नयी दिल्ली, पांच फरवरी जम्मू कश्मीर के बारामूला से सांसद रशीद इंजीनियर के खिलाफ आतंकवाद के वित्तपोषण के एक मामले में उनकी जमानत याचिका पर कौन सुनवाई करेगा, यह सवाल अदालतों को उलझाए हुए है और यह मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंच गया है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस मुद्दे पर अदालतों के अधिकार क्षेत्र को लेकर पेचीदा स्थिति बनी हुई है।
रशीद इंजीनियर की जमानत पर सुनवाई का मुद्दा तब उठा जब एक एनआईए अदालत ने कहा कि वह आतंकवाद के आरोपों का सामना कर रहे जेल में बंद सांसद की जमानत याचिका पर आदेश पारित नहीं कर सकती।
दूसरी ओर, राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) जिन मामलों में सुनवाई करता है, उनमें विधान सांसदों के लिए बनी विशेष अदालतों द्वारा सुनवाई किए जाने की अनुमति नहीं देता है।
यह सवाल दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है और उसके रजिस्ट्रार जनरल ने हाल में उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करने के लिए पत्र लिखा है।
राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने 2017 के आतंकवाद वित्तपोषण मामले में रशीद को गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया था। उन्होंने बारामूला निर्वाचन क्षेत्र से 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। रशीद 2019 से तिहाड़ जेल में बंद हैं।
एमपी/एमएलए अदालतों की स्थापना
उच्चतम न्यायालय ने 2017 में विशेष एमपी/एमएलए अदालत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। उसने केंद्र से सांसदों और विधायकों से जुड़े आपराधिक मामलों में त्वरित सुनवाई के लिए राज्यों में 12 विशेष अदालतें स्थापित करने को कहा।
इसके अनुसार, दिल्ली और अन्य राज्यों में विशेष अदालतें गठित की गईं।
वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन का कहना है कि उच्चतम न्यायालय को एमपी/एमएलए अदालतों के पूरे मुद्दे की फिर से जांच करने की जरूरत है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी तक दिल्ली में छह एमपी/एमएलए अदालतों में 124 मामले लंबित थे।
एनआईए अदालत का गठन एनआईए अधिनियम, 2008 के तहत किया गया था। कानून एजेंसी को भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों आदि से संबंधित अपराधों की जांच और मुकदमा चलाने की अनुमति देता है।
जाने-माने वरिष्ठ वकील अमित देसाई दो मुद्दों को रेखांकित करते हैं। एक संसद में भाग लेने का और दूसरा अधिकार का।
उन्होंने कहा कि दोषसिद्धि तक आरोपी को बेगुनाह माना जाता है। रशीद के मामले में सुनवाई चल रही है और कुल 248 गवाहों में से अभियोजन पक्ष के 21 गवाहों से पूछताछ की जा रही है।
देसाई ने कहा, ‘‘अगर पहली अदालत दोषी करार देती है और अपील लंबित रहने तक दोषसिद्धि पर रोक लगा दी जाए तो आपको भाग लेने का अधिकार है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हिरासत में लंबित जांच या मुकदमा ऐसे किसी व्यक्ति को कामकाज या उसके पेशे के मौलिक अधिकार से वंचित नहीं कर सकते। इसलिए आरोपपत्र दायर होने के बाद भी कई सांसदों को संसद में उपस्थित रहने की अनुमति दी जाती है।’’
देसाई ने कहा कि किसी गैर-पक्षपाती, नियामक इकाई जो कि अनुशासन समिति हो, द्वारा तय किया जा सकता है कि वे उस व्यक्ति को अयोग्य करार देना चाहते हैं या नहीं।
देसाई ने कहा कि अगर रशीद जेल से अपने नामांकन पत्र दाखिल कर सकते हैं तो उससे यह परिणाम निकाला जा सकता है कि उन्हें संसद में भाग लेने की अनुमति है।
उन्होंने कहा कि इस तरह की जटिल स्थिति में उच्च न्यायालय निश्चित रूप से अधिकार क्षेत्र तय कर सकती है और जमानत या कार्यवाही में शामिल होने पर फैसला कर सकती है।
विशेष अधिवक्ता विकास पाहवा के अनुसार विशेष कानूनों में आरोपी लोगों पर कानून के तहत गठित विशेष अदालतों द्वारा मुकदमा चलना चाहिए, न कि सांसदों या विधायकों के लिए गठित विशेष अदालतों द्वारा।
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)