देश की खबरें | वस्त्र निर्माता कंपनियों के “कोरोना-रोधी” फैब्रिक बनाने के दावों पर वैज्ञानिक जगत में संशय

नयी दिल्ली, 16 जुलाई वस्त्र उद्योग की बड़ी कंपनियां महामारी के इस समय में कोरोना वायरस को खत्म करने वाले वस्त्र बनाने का दावा कर रही हैं लेकिन वैज्ञानिक जगत को इन दावों पर संशय है।

पिछले कुछ महीनों में कम से कम चार कंपनियों ने तकनीक की मदद से ऐसा वस्त्र बनाने का दावा किया है कि वस्त्र पर वायरस के आते ही वह खत्म हो जाएगा।

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ऐसे समय में जब लोगों में नए कपड़े खरीदने का उत्साह नहीं है और बड़े और छोटे उद्योग अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं, ऐसा लगता है कि इन कंपनियों ने प्रासंगिक बने रहने की चाबी ढूंढ निकाली है।

वस्त्र निर्माता कंपनियों का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि वे कोविड-19 के प्रसार को कम करने में अपना योगदान दे सकेंगी।

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डोनियर इंडस्ट्रीज के प्रबंध निदेशक राजेंद्र अग्रवाल ने कहा, “हालांकि हम मास्क लगा रहे हैं, दस्ताने पहन रहे हैं और सेनिटाइज कर रहे हैं, लेकिन यह भी जरूरी है कि हमारे कपड़े हमारी सुरक्षा करें। कपड़ों पर बैक्टीरिया और वायरस को रहने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है जिससे उनके फैलने की आशंका बढ़ जाती है।”

अग्रवाल की कंपनी ने अप्रैल में “कोरोना रोधी” धागों की शुरुआत की थी जो “नियो तकनीक” के इस्तेमाल से वायरस को निष्प्रभावी कर देती है।

उन्होंने कहा कि मेलबर्न की प्रयोगशाला में इसकी जांच की गई थी और नतीजे में यह कोरोना वायरस को खत्म करने में प्रभावी सिद्ध हुई।

जून में ऑस्ट्रिया की कंपनी लेंजिंग ने भारत की रूबी मिल्स के साथ मिलकर “एच पॉजिटिव” तकनीक से बनी फैब्रिक की शुरुआत की थी।

इस क्षेत्र में प्रयोग करने वाली अन्य कंपनियों में सियाराम और अरविंद लिमिटेड शामिल हैं।

रूबी मिल्स और लेंजिंग का कहना है कि उनके वस्त्रों के इस्तेमाल से अस्पताल की यूनिफॉर्म, बिस्तर की चादर, पीपीई और मास्क ही नहीं बल्कि प्रतिदिन पहने जाने वाले परिधान भी बनाए जा सकते हैं।

कंपनियों ने दावा किया एच पॉजिटिव तकनीक पोलिस्टर, लिनेन और कॉटन इत्यादि में भी उपलब्ध है।

डोनियर का भी कहना है कि उनकी नियो तकनीक वाली फैब्रिक से सूट, शर्ट, ब्लॉउज जैसे किसी भी प्रकार के परिधान बनाए जा सकते हैं।

इन कंपनियों को उम्मीद है कि कोरोना रोधी फैब्रिक भी उसी प्रकार बिक सकेगी जैसे सेनिटाइजर, मास्क और साबुन बिक रहे हैं।

हालांकि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को इसमें संशय है।

अशोका विश्वविद्यालय में भौतिकी और जीव विज्ञान के प्राध्यापक गौतम मेनन ने कहा, “मुझे लगता है कि कोरोना रोधी फैब्रिक विकसित करने के पीछे यह भावना है कि भारतीय उपभोक्ता हर वो चीज खरीदने के प्रति उत्साही होगा जिससे कोविड-19 से बचने में मदद मिल सके।”

उद्यमी से अकादमिक बने कौस्तुभ धर्गालकर के अनुसार कंपनियां नए उत्पाद लाने के लिए उपभोक्ताओं की भावनाओं का शोषण करती हैं।

उन्होंने कहा कि कंपनियां वर्तमान स्थिति में भय और परेशानी में रह रहे लोगों को निशाना बना रही हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे उत्पादों की लोकप्रियता का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी।

उन्होंने कहा कि महामारी की चपेट में जल्दी आने वाले वर्ग के लोगों जैसे बच्चे बूढ़े और रोगी ऐसे उत्पादों के प्रति आकर्षित होंगे।

धर्गालकर ने कहा कि शुरुआत में अधिक मात्रा में उत्पाद बिक सकते हैं लेकिन आने वाले समय में कब तक बिकेंगे यह बाद में पता चलेगा।

कई वैज्ञानिकों और चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि वायरस कितनी देर तक कपड़े जैसी कोमल सतह पर जीवित रह सकता है इसका पता चलना अभी बाकी है और साबुन से कपड़ों को धोना वर्तमान में सबसे अच्छा उपाय है।

जीन स्ट्रिंग्स डायगनोस्टिक सेंटर में प्रयोगशाला की प्रमुख अल्पना राजदान ने कहा कि कपड़ों के द्वारा वायरस के तेजी से फैलने का कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है।

उन्होंने कहा, “हालांकि हमें यह पता है कि वायरस को जीवित रहने के लिए नमी की जरूरत होती है। इसलिए वस्त्रों को जितना हो सके नमी से मुक्त रखने, धोने और सुखाने से कपड़े आपके सच्चे दोस्त बन सकते हैं।”

नोएडा स्थित फोर्टिस अस्पताल में फेफड़ा रोग विशेषज्ञ मृणाल सरकार भी इससे सहमत हैं।

उन्होंने कहा, “कपड़े संक्रमित हो भी जाएं तब भी जब तक कोई व्यक्ति उन्हें छूने के बाद अपने चेहरे को नहीं छुएगा तब तक वह संक्रमित नहीं होगा। जिन्हें अपने कपड़ों के संक्रमित होने का भय है वे साबुन से कपड़े धो सकते हैं जिसके बाद वायरस मर जाएगा।”

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