ताजा खबरें | फिल्मों में संवेदनशीलता और कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर समिति का जोर

Get latest articles and stories on Latest News at LatestLY. संसद की एक समिति ने फिल्मों को लेकर अंकुश और जरूरत से ज्यादा विनियमन को गलत बताया है, साथ ही कहा कि भारत जैसे सांस्कृतिक विविधता वाले देश में फिल्में बनाते और दिखाते समय देश के लोगों की संवेदनशीलता का ध्यान रखते हुए रचनात्मकता, कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संतुलन बनाना जरूरी है।

नयी दिल्ली, दो अगस्त संसद की एक समिति ने फिल्मों को लेकर अंकुश और जरूरत से ज्यादा विनियमन को गलत बताया है, साथ ही कहा कि भारत जैसे सांस्कृतिक विविधता वाले देश में फिल्में बनाते और दिखाते समय देश के लोगों की संवेदनशीलता का ध्यान रखते हुए रचनात्मकता, कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संतुलन बनाना जरूरी है।

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के कार्यकरण की समीक्षा विषय पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने मंगलवार को लोकसभा में पेश रिपोर्ट में यह बात कही।

समिति ने विषय की जांच के दौरान पाया कि चर्चा मुख्य रूप से इस विवाद के इर्द-गिर्द घूमती है कि क्या फिल्मों को प्रमाणित करते समय कट या संशोधन किया जाना चाहिए। यह विशुद्ध रूप से प्रमाणन मॉडल के आधार पर बिना किसी कट या संशोधन के होना चाहिए और इसका कोई विनियमन नहीं होना चाहिए।

समिति ने संज्ञान लिया कि फिल्म उद्योग के अधिकांश पक्षकारों ने विनियमन के किसी भी रूप के विरुद्ध आवाज उठाई है और उन्होंने न्यूनतम विनियमन यानी केवल प्रमाणन की इच्छा व्यक्त की। उसने इसके औचित्य के तौर पर यह बताया कि प्रमाणन दर्शकों को विकल्प प्रदान करता है और सामग्री को जबरदस्ती नहीं दिखाया जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, ओटीपी पर देखी जाने वाली सामग्री के संबंध में समिति को अलग-अलग विचार प्राप्त हुए। एक मत यह था कि सभी प्लेटफार्म पर देखी जाने वाली सामग्री के लिए एक ही नियम हो और इस प्रकार ओटीटी (ओवर द टॉप) पर सामग्री के लिए भी किसी प्रकार की निगरानी तंत्र लागू नहीं होना चाहिए। जबकि दूसरा मत यह था कि फिल्म की सामग्री को भी ओटीपी की तरह स्व-विनियमित किया जाना चाहिए।

इस संबंध में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) की भूमिका की जांच करते हुए समिति ने पाया कि बोर्ड ज्यादातर प्रमाणन पर काम कर रहा है, सेंसरशिप पर नहीं।

सीबीएफसी ने सूचित किया कि कई बार कुछ श्रेणियों के तहत प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए फिल्म निर्माता स्वयं कट या संशोधन करने की पेशकश करते हैं क्योंकि कभी-कभी फिल्म निर्माता इस बात से अनभिज्ञ होते हैं कि कोई विशेष दृश्य, किसी नियम या अधिनियम की धारा का उल्लंघन कर रहा है या नहीं।

समिति ने इस बात पर चिंता जताई कि ऐसी फिल्मों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में तेजी से कम होती जा रही है जिन्हें बिना किसी कट के मंजूरी दी गई और फिल्म प्रमाणन पर विवादों की संख्या बढ़ गई है।

इस संबंध में सीबीएफसी के एक सदस्य ने समिति को बताया कि विनियमन मीडिया या फिल्म उद्योग के अभिनेताओं या सामग्री निर्माताओं के लिए एक डरावना शब्द है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश में किसी निगरानी तंत्र के न होने की स्थिति में मुख्य चिंता बच्चों के समक्ष अवांछित सामग्री के आने के रूप में बनी रहेगी।

रिपोर्ट के अनुसार, एक हित धारक के इस कथन को ध्यान में रखते हुए कि फिल्म निर्माताओं की रचनात्मक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए, समिति यह महसूस करती है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के साथ संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रयोग पर औचित्यपूर्ण प्रतिबंध मौजूद हैं तथा अभिव्यक्ति के अधिकारों के संरक्षण का भी उपबंध है।

इसके अनुसार, प्रमाणन के मुद्दे पर विचार-विमर्श के दौरान सीबीएफसी के सदस्य ने समिति को बताया कि प्रत्येक देश की सांस्कृतिक विशेषता होती है, उदाहरण के लिए फ्रांस में स्त्री, पुरुष की नग्नता समस्या नहीं है लेकिन गैंगस्टर संबंधी फिल्में समस्या हैं। इसी तरह अन्य देशों में कुछ विषय विवादास्पद मुद्दे हो सकते हैं, पर कोई देश अपनी परंपरा से विरक्त नहीं हो सकता।

समिति महसूस करती है कि भारत जैसे सांस्कृतिक विविधता वाले देश में फिल्में बनाते और दिखाते समय देश के लोगों की संवेदनशीलता पर विचार करने की आवश्यकता है और इसी कारण विचार-विमर्श और प्रमाणन भी आवश्यक है।

रिपोर्ट के अनुसार, समिति का विचार है कि हिंसक और अश्लील सामग्री तक आसानी से पहुंच होने से संवेदनशीलता कम हो जाएगी और खासकर बच्चे प्रभावित होंगे जिसके परिणाम की तुलना पैसे से हुए लाभ से नहीं की जा सकती।

रिपोर्ट के मुताबिक समिति यह भी महसूस करती है कि इस वक्त अंकुश और जरूरत से ज्यादा विनियमन सरासर गलत होगा। समिति का मानना है कि सूचना प्रसारण मंत्रालय, सीबीएफसी और फिल्म उद्योग की एक बड़ी जिम्मेदारी है कि विचारों, रचनात्मकता, कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने और देश की सांस्कृतिक विविधता और फिल्म की विषयवस्तु के प्रभावों के बारे में संवेदनशील होने की आवश्यकता है।

इसमें कहा गया है, ‘‘समिति आशा करती है कि मंत्रालय और सीबीएफसी, फिल्म बिरादरी के साथ मिलकर संतुलन को प्राप्त करने के लिए सभी प्रयास करेंगे।’’

दीपक

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