देश की खबरें | खाद्य-असुरक्षा वाले घरों में बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं पेश आने की अधिक संभावना: अध्ययन

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. पर्याप्त मात्रा में खाद्य आपूर्ति वाले परिवारों की तुलना में खाद्य-असुरक्षा वाले घरों में रहने वाले बच्चों-किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पेश आने की 55 प्रतिशत अधिक संभावना होती है और उन्हें चिकित्सक के पास जाने की आवश्यकता पड़ती है। एक अध्ययन से यह जानकारी सामने आई है।

नयी दिल्ली, 24 जुलाई पर्याप्त मात्रा में खाद्य आपूर्ति वाले परिवारों की तुलना में खाद्य-असुरक्षा वाले घरों में रहने वाले बच्चों-किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पेश आने की 55 प्रतिशत अधिक संभावना होती है और उन्हें चिकित्सक के पास जाने की आवश्यकता पड़ती है। एक अध्ययन से यह जानकारी सामने आई है।

यह शोध हाल में ‘कनाडियन मेडिकल एसोसिएशन जर्नल’ में प्रकाशित हुआ है, जिसमें 32,321 बच्चों एवं किशोरों पर कनाडा के सामुदायिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आबादी स्वास्थ्य सर्वेक्षण आंकड़े का विश्लेषण किया गया है।

शोधकर्ताओं ने घरों में खाद्यान्न की उपलब्धता का खाद्य-सुरक्षा, आंशिक रूप से खाद्य असुरक्षा, मध्यम रूप से खाद्य असुरक्षा या गंभीर रूप से खाद्य असुरक्षा के रूप में वर्गीकरण किया है।

अध्ययन में शामिल किये गए कुल बच्चों/किशोरों में 5,216 (16.1 प्रतिशत) खाद्य-असुरक्षा, 1,952 (छह प्रतिशत) आंशिक रूप से खाद्य-असुरक्षा, 2,348 (7.3 प्रतिशत) मध्यम रूप से खाद्य-असुरक्षा और 916 गंभीर रूप से खाद्य-असुरक्षित पाये गए।

उन्होंने यह भी पाया कि खाद्य असुरक्षा वाले परिवारों में रहने वाले बच्चों एवं किशोरों में गंभीर रोगों का खतरा भी 74 प्रतिशत अधिक होता है और उन्हें मानसिक या मनोविकार के कारण अस्पताल जाने की भी नौबत आ सकती है।

इनमें सामान्य तौर पर तंत्रिका विकास से संबंधित रोग, मूड या घबराहट से संबंधित रोग, सामाजिक समस्या और अन्य मानसिक स्वास्थ्य मुद्दे शामिल हैं।

कनाडा में वेस्टर्न यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर केली एंडरसन ने कहा, ‘‘घरेलू खाद्य असुरक्षा और मानसिक तथा मादक द्रव्यों के सेवन संबंधी विकारों, इन दोनों स्थितियों में से प्रत्येक में बच्चों और किशोरों के बीच सामाजिक, शैक्षिक और विकासात्मक परिणामों पर नकारात्मक परिणाम पाए गए हैं।’’

वेस्टर्न यूनिवर्सिटी में अध्ययन की वरिष्ठ मुख्य लेखक सलीमा शरीफ ने कहा, ‘‘इन नतीजों का अगर विश्लेषण करें तो ये चिंताजनक है और हमें खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे परिवारों की मदद के लिए मजबूत सार्वजनिक नीति लाने की आवश्यकता है।’’

शोधकर्ताओं ने कहा कि आंकड़ा करीब एक दशक पुराना है और हाल के वर्षों में खासकर कोविड-19 महामारी के दौरान खाद्य असुरक्षा बढ़ी है।

अध्ययन में कहा गया है कि खाद्य असुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के बीच संबंध और जटिल हो सकता है।

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