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जरुरी जानकारी | अगस्त में अनाज, दाल, खाद्य तेल कीमतों में नरमी: आरबीआई लेख

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. खाद्य मुद्रास्फीति के मोर्चे पर कुछ राहत मिलने की उम्मीद दिख रही है। अनाज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में अगस्त में व्यापक स्तर पर नरमी देखी गयी है। अर्थव्यवस्था की स्थिति पर सोमवार को जारी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बुलेटिन में यह कहा गया है।

जरुरी जानकारी | अगस्त में अनाज, दाल, खाद्य तेल कीमतों में नरमी: आरबीआई लेख

मुंबई, 19 अगस्त खाद्य मुद्रास्फीति के मोर्चे पर कुछ राहत मिलने की उम्मीद दिख रही है। अनाज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में अगस्त में व्यापक स्तर पर नरमी देखी गयी है। अर्थव्यवस्था की स्थिति पर सोमवार को जारी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बुलेटिन में यह कहा गया है।

अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में सालाना बदलाव के आधार पर मापी जाने वाली सकल (हेडलाइन) मुद्रास्फीति बीते माह जुलाई में घटकर 3.5 प्रतिशत पर आ गयी जो जून में 5.1 प्रतिशत थी।

रिजर्व बैंक के अगस्त माह के बुलेटिन में कहा गया है कि महंगाई दर में 1.54 प्रतिशत की कमी का कारण 2.9 प्रतिशत का अनुकूल तुलनात्मक आधार है। इससे 1.4 प्रतिशत से अधिक का सकारात्मक असर पड़ा है।

रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर माइकल देबब्रत पात्रा की अगुवाई वाली टीम के लिखे लेख में कहा गया है, ‘‘अगस्त महीने में अबतक (12 तक) खाद्य वस्तुओं के दाम के आंकड़ों से पता चलता है कि अनाज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में व्यापक स्तर पर नरमी आई है।’’

सब्जियों में आलू के दाम लगातार ऊंचे बने हुए हैं जबकि प्याज तथा टमाटर के दाम में कमी आई है।

बुलेटिन में ‘क्या खाद्य कीमतों का असर अन्य क्षेत्रों पर हो रहा है? शीर्षक से लिखे लेख में कहा गया है कि 2022-23 से मुख्य (कोर) मुद्रास्फीति में कमी आ रही है। इसका कारण मुख्य रूप से मौद्रिक नीति उपायों, रुख और लागत आधारित झटकों में कमी के कारण है।

हालांकि, इन वर्षों में खाद्य कीमतों में तेजी मुख्य मुद्रास्फीति पर उल्टा दबाव डाल रही हैं, लेकिन मौद्रिक नीति के तहत महंगाई में कमी लाने के उपायों से यह काबू में है।

पात्रा, जॉयस जॉन और आशीष थॉमस जॉर्ज के लिखे लेख में कहा गया है क्या महंगाई में कमी लाने के उपायों को हल्का करना चाहिए? सकल मांग बढ़ रही है। इसके साथ, वैश्विक स्तर पर जारी तनाव के बीच लागत आधारित जोखिम भी है। इसको देखते हुए मुख्य और सकल मुद्रास्फीति के बढ़ने का जोखिम है और यह नियंत्रण से बाहर जा सकता है।

लेखकों के अनुसार, यदि खाद्य कीमतों का दबाव बना रहता है और दूसरे क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है, तो एक सतर्क मौद्रिक नीति दृष्टिकोण जरूरी है।

इसमें कहा गया है, ‘‘परंपरागत रूप से मौद्रिक नीति पर विचार करते समय यह माना जाता था कि खाद्य वस्तुओं के दाम में तेजी अस्थायी है, लेकिन अब स्थिति बदल रही है कई मामलों में खाद्य महंगाई दर लंबे समय से बनी हुई है...।’’

कीमत में तेजी के बाद भी खाने के सामान की मांग बनी हुई है, इससे खाद्य मुद्रास्फीति बनी हुई है और यह चिंताजनक है। इसका लागत, सेवा शुल्क तथा उत्पादन के दाम पर असर हो सकता है। यानी खाद्य मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ा है।

इसमें कहा गया है कि खाद्य कीमतों के तेजी का स्रोत मौद्रिक नीति के दायरे से बाहर हो सकता है, लेकिन जब खाद्य मुद्रास्फीति के कारण महंगाई अन्य क्षेत्रों में फैलती है, तो इसपर काबू पाने के लिए मौद्रिक नीति के तहत कदम उठाने की जरूरत होती है। यह कीमत स्थिरता और भरोसा बनाये रखने के लिए जरूरी है।

केंद्रीय बैंक ने यह साफ किया है कि बुलेटिन में प्रकाशित लेख लेखकों के विचार हैं और वह रिजर्व बैंक के विचारों से मेल नहीं खाते हैं।

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(The above story first appeared on LatestLY on Aug 19, 2024 08:20 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).