विदेश की खबरें | भांग : कैसे हमारी बोध क्षमता और मनोवृत्ति को प्रभावित करता

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कैम्ब्रिज, 17 अप्रैल (द कन्वरसेशन) भांग का इस्तेमाल हजारों साल से इंसानों द्वारा किया जा रहा है और यह मौजूदा समय में सबसे लोकप्रिय नशीले पदार्थों में से एक है। इसके प्रभाव से व्यक्ति आनंद और राहत का अनुभव करता है। कई देशों में इसे कानूनी तौर पर लेने की भी अनुमति है।

लेकिन कैसे ड्रग लेने का असर दिमाग पर पड़ता है? हाल में तीन अध्ययन जर्नल ऑफ साइकोफार्माकोलाजी, न्यूरोसाइकोफार्माकोलॉजी और इंटरनेशनल जर्नल ऑफ न्यूरोसाइकोफार्माकोलॉजी में प्रकाशित हुआ, हमने प्रदर्शित किया है कि यह संज्ञानात्मक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

संयुक्त राष्ट्र के ड्रग और अपराध कार्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2018 में 15 से 64 साल उम्र के करीब 19.2 करोड़ लोगों ने भांग का इस्तेमाल आनंद के लिए किया।

युवा इसको लेकर दीवाने हैं और 18 से 25 वर्ष उम्र के 35 प्रतिशत लोग जबकि 26 से ऊपर के 10 प्रतिशत लोग इसका इस्तेमाल करते हैं।

यह संकेत करता है कि भांग के मुख्य उपयोगकर्ता किशोर और युवा वयस्क हैं, जिनका दिमाग उस वक्त भी विकास की प्रक्रिया में होता है। इसलिए वे विशेषतौर पर भांग के इस्तेमाल से दिमाग पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर संवेदनशील श्रेणी में हैं।

भांग में टेट्राहाइड्रोकैनाबिनॉल (टीएचसी) मुख्य साइकोएक्टिव (मानसिक रूप से उत्तेजित करने वाला) यौगिक है। यह दिमाग के ‘‘ इंडोकैनाबिनॉयड सिस्टम’’ पर कार्य करता है, जो ‘रिसेप्टर’ हैं और भांग में मौजूद रासायनिक पदार्थों के प्रति प्रतिक्रिया करता है।

भांग के ‘रिसेप्टर’ मुख्य रूप से दिमाग के ‘प्रीफ्रंटल (पुरोमुखीय)’ और ‘लिम्बिक’ हिस्से में पाए जाते हैं। ये दिमाग के रसायनों डोपामाइन, गामा एमिनोबुट्रिक एसिड (जीएबीए) और ग्लुटामेट के संकेतों को नियंत्रित करते हैं।

हम जानते हैं कि डोपामाइन प्रेरित करने, प्रतिफल और सीखने में शामिल होता है। जीएबीए और ग्लुटामेट संज्ञानात्मक प्रक्रिया का हिस्सा होता है, जिसमें सीखना और याददाश्त शामिल है।

भांग का इस्तेमाल बोध क्षमता को प्रभावित कर सकता है विशेषतौर पर उनमें जो भांग के इस्तेमाल से जुड़े विकार से ग्रस्त हैं। इसको मादक पदार्थ लेने की हमेशा इच्छा और दैनिक गतिविधियों जैसे कार्य या शिक्षा के बाधित होने से परिभाषित किया जा सकता है।

आकलन के मुताबिक, भांग का इस्तेमाल करने वाले करीब 10 प्रतिशत लोगों को इन विकारों के लिए इलाज की जरूरत होती है।

हमने अपने अनुसंधान में, विकार से ग्रस्त 39 लोगों की बोध क्षमता को परखा और उनकी तुलना 20 ऐसे लोगों से की जो कभी भांग का सेवन नहीं करते या विरला ही उन्होंने इसका सेवन किया है।

हमने पाया कि विकार से ग्रस्त प्रतिभागियों ने कैम्ब्रिज न्यूरोसाइकोलॉजिकल टेस्ट ऑटोमेटेड बैटरी (सीएनटीएबी) की यादाश्त परीक्षा में भांग नहीं लेने वालों के मुकाबले बहुत ही खराब प्रदर्शन किया।

इसने (भांग ने) उनकी ‘‘कार्य को अमल में लाने की क्षमता’’ को भी नकारात्मक तरीके से प्रभावित किया, जो उनकी मानसिक प्रक्रिया को इंगित करता है जिनमें सोचने का लचीला रुख शामिल है। यह असर उम्र से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है, जैसे जिन लोगों ने कम उम्र से भांग का सेवन शुरू किया था, वे अधिक कार्यक्षमता के मामले में अक्षम थे।

संज्ञानात्मक गड़बड़ी मामूली मात्रा में भांग लेने वालों में भी दिखी। ऐसे लोग अन्य के मुकाबले अधिक जोखिम भरे निर्णय लेते हैं और योजना बनाने में समस्या का सामना करते हैं।

हालांकि, अधिकतर अध्ययन पुरुषों पर किए गए हैं, लेकिन संज्ञानात्मक क्षमता पर भांग के इस्तेमाल के असर में लैंगिक अंतर के प्रमाण मिले हैं।।

हमने दिखाया कि भांग खाने वाले पुरुषों में दृश्यों को पहचानने के मामले में कमजोर याददाश्त होती है जबकि भांग खाने वाली महिलाओं में ध्यान केंद्रित करने और काम को अमल में लाने की अधिक समस्या होती है।

भांग का इस्तेमाल हमारे अनुभव को भी प्रभावित करता है और इस प्रकार यह हमारे विचार को भी प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए पूर्व के कुछ शोध में इंगित किया गया कि पारितोषिक और प्रेरणा का भाव, जिस प्रक्रिया में दिमाग का तंत्र भी शामिल होता है, भांग का सेवन करने से बाधित होता है।

यह स्कूल और कार्य में हमारे प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है क्योंकि इसकी वजह से हम कठिन मेहनत करने के लिए कम प्रोत्साहित हो सकते हैं और इससे हमें कम पारितोषिक मिलने का भाव भी पैदा हो सकता है।

हमारे नवीनतम अध्ययन में हमने दिमाग मानचित्रण कार्य किया जिसमें प्रतिभागियों को स्कैनर के नीचे रखा गया और उन्हें नारंगी और नीले स्कॉवयर दिखाए।

इससे हमें यह जांचने में मदद मिली की दिमाग पारितोषिक के प्रति कैसे प्रतिक्रिया करता है। हमने इस दौरान विशेष तौर पर ‘वेंट्रल स्ट्रेटम’’ पर ध्यान केंद्रित किया जो दिमाग में इनाम प्रणाली का अहम क्षेत्र है।

हमने पाया कि दिमाग की पारितोषिक प्रणाली पर इसका असर सूक्ष्म है और भांग का सीधा प्रभाव वेंट्रल स्ट्रेटम पर नहीं दिखा। हालांकि, इस अध्ययन में शामिल लोग भांग का मध्यम इस्तेमाल करने वाले थे।

इसका असर और स्पष्ट आ सकता था अगर प्रतिभागी अधिक मात्रा में भांग इस्तेमाल करने वाले होते, जैसा कि उनमें भांग से उत्पन्न विकार देखा जाता है।

ऐसे भी सबूत है कि भांग से दिमागी स्वास्थ्य समस्या आ सकती है। हमने दर्शाया है कि इसका संबंध उच्च ‘‘एनहिडोनिया’’ से है, जिसमें युवाओं में आनंद की अनुभूति नहीं होती। रोचक तथ्य है कि यह प्रभाव खासतौर पर कोविड-19 महामारी लॉकडाउन के दौरान देखा गया।

किशोरवस्था में भांग के इस्तेमाल करने से मनोरोग और यहां तक स्किजोफ्रीनिया होने का खतरा है।

एक अध्ययन में संकेत मिलता है कि मध्यम मात्रा में भांग का इस्तेमाल करने से युवाओं में मनोरोग के लक्षण होने के खतरे बढ़ जाते हैं, लेकिन मनोविकृति की प्रवृत्ति वाले लोगों में इसका प्रभाव अधिक देखने को मिलता है।

हम नहीं जानते कि भांग का संबंध क्यो मनोरोग से है लेकिन परिकल्पना इंगित करती हे कि डोपामाइन और ग्लुटामेट इस परिस्थिति के लिए न्यूरोबाइयोलॉजी में अहम हो सकता है।

कुल 780 किशोरों पर किए गए एक अन्य अध्ययन में संकेत मिलता है कि भांग के इस्तेमाल और मनोरोग का संबंध दिमाग के उस हिस्से से है जिसे ‘अनकस’ कहते हैं।

भांग के इस्तेमाल का संज्ञानात्मक और मनोविज्ञान पर असर बहुत संभव है कि उसकी खुराक, लिंग, आनुवंशिकी खतरे और उम्र पर आधारित हो लेकिन हमे यह पता लगाने की जरूरत है कि क्या इसका असर अस्थायी है या स्थायी। कई अध्ययनों को एक लेख में सारगर्भित करने पर संकेत मिलता है कि भांग का हल्का इस्तेमाल एक समय के बाद कमजोर होता जाता है।

लेकिन अगर ऐसी स्थिति है तो भी लंबे समय तक भांग के इस्तेमाल से हमारे दिमाग पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार करने की जरूरत है खासतौर पर युवाओं के लिए जिनका दिमाग अब भी विकसित होने की अवस्था में है।

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