नयी दिल्ली, पांच जनवरी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी कार्यक्रम के अनुपालन का प्रभावी प्रबंधन नहीं होने को रेखांकित करते हुए कहा कि परियोजनाओं की समय समय पर निगरानी तथा पूरी हुई परियोजनाओं का समय पर मूल्यांकन नहीं किया गया तथा पेटेंट को लेकर भी अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुए।
संसद के शीतकालीन सत्र में पेश वैज्ञानिक एवं पर्यावरण संबंधी मंत्रालयों/विभागों पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की अनुपालन आडिट रिपोर्ट संख्या 21/2022 में यह बात कही गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने अपने चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी कार्यक्रम के अनुपालन का प्रभावी प्रबंधन नहीं किया । इसके अलावा परियोजना प्रस्तावों, इनका अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये जरूरी सुरक्षा प्रोटोकॉल, परियोजनाओं की समय समय पर निगरानी तथा पूरी हुई परियोजनाओं का समय पर मूल्यांकन नहीं किया गया।
इसमें कहा गया है कि इस संबंध में उत्कृष्ठ पत्रिकाओं में प्रकाशनों की संख्या काफी कम रही है जो परियोजनाओं की खराब गुणवत्ता का संकेत है।
रिपोर्ट के अनुसार, चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी कार्यक्रम के तहत परियोजनाओं पर 1203.40 करोड़ रूपये आवंटित किये जाने के बावजूद केवल एक पेटेंट मंजूर किया गया जिसमें कोई प्रौद्योगिकी हस्तांतरण शामिल नहीं था । यह मानव स्वास्थ्य एवं कुशलता को बेहतर बनाने के क्षेत्र में शोध परियोजनाओं की खराब योजना और परिणाम का संकेत है।
इसमें कहा गया है कि जैव प्रौद्योगिकी पेटेंट सुविधा प्रकोष्ठ (बीपीएफसी) की स्थापना जुलाई 1999 में की गई थी ताकि हितधारकों के लिये प्राथमिकता के आधार पर बीपीएफसी के जरिये पेटेंट दाखिल करने की सुविधा प्रदान की जा सके और शोध के परिणाम एवं उपयोग का लाभ उठाया जा सके।
कैग ने कहा, ‘‘हमने पाया कि जिन 107 परियोजनाओं के पूरा होने की रिपोर्ट दाखिल की गई, उनमें से 11 परियोजनाओं में 16 औपबंधिक पेटेंट दायर किये गए और केवल एक पेटेंट को मंजूरी दी गई। ’’
इसमें कहा गया है कि इसमें बीपीएफसी के जरिये केवल दो पेटेंट दाखिल किये गए जो इस सुविधा केंद्र के मामूली उपयोग का संकेत देता है।
रिपोर्ट के अनुसार, विभाग ने कहा कि बीपीएफएसी का गठन पेटेंट दाखिल करने की प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिये किया गया था और इसका उपयोग अनिवार्य नहीं है।
कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह जवाब स्वीकार्य नहीं है क्योंकि विभाग ने बीपीएफसी की स्थापना वैज्ञानिकों एवं शोधकर्ताओं में बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) के बारे में जागरूकता एवं सुविधा के लिए एकल खिड़की व्यवस्था के मकसद से की गई थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बीपीएफसी का उपयोग नहीं होने से विभाग आईपीआर के क्षेत्र में गतिविधियों से अवगत नहीं रहेगी और नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और जैव प्रौद्योगिकी उद्योगों आदि के ध्यानार्थ महत्वपूर्ण मुद्दों को नहीं ला पायेगी।
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