नयी दिल्ली, आठ सितंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि बैंक लुकआउट सर्कुलर का इस्तेमाल पैसा वसूलने के उपाय के रूप में नहीं कर सकते हैं।
अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में आरोपी बनाए जाने की संभावना मात्र से उसके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी नहीं किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि यह किसी व्यक्ति से विदेश यात्रा का अधिकार छीनने जैसा है, जो संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि लुक आउट सर्कुलर किसी व्यक्ति का जांच अधिकारियों या अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण कराने के लिए एक उपाय है और इसे केवल तभी जारी किया जा सकता है, जब इसके लिए पर्याप्त कारण हों।
अदालत ने ‘लॉयड इलेक्ट्रिक एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड’ के पूर्व निदेशक निपुण सिंघल के खिलाफ बैंक ऑफ बड़ौदा के आग्रह पर जारी लुक आउट सर्कुलर को रद्द करते हुए ये टिप्पणियां कीं, जो कुछ वित्तीय लेनदेन को लेकर सीबीआई जांच का सामना कर रहे हैं।
अदालत को सूचित किया गया कि याचिकाकर्ता के कंपनी छोड़ने के लगभग 18 महीने बाद, नवंबर 2018 में इसे गैर-निष्पादित परिसंपत्ति घोषित कर दिया गया था और जनवरी 2022 में, याचिकाकर्ता को बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा इरादतन चूककर्ता घोषित किए जाने के बारे में कारण बताओ नोटिस मिला।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि सीबीआई के अनुसार, याचिकाकर्ता इस मामले में आरोपी नहीं था और अधिकांश लेनदेन उनके इस्तीफे के बाद हुए थे।
अदालत ने अपने हालिया आदेश में कहा, ‘‘याचिकाकार्ता की यात्रा जून, 2022 से बाधित की गई, जबकि वह किसी प्राथमिकी में आरोपी भी नहीं है। केवल यह संभावना कि किसी व्यक्ति को अंततः आरोपी बनाया जा सकता है, लुक आउट सर्कुलर जारी करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।’’
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)












QuickLY