नयी दिल्ली, 17 अगस्त अशोक विश्वविद्यालय के संकाय सदस्यों के एक समूह ने कुलपति को पत्र लिखकर दावा किया है कि भारत में विश्वविद्यालयों के भीतर विचारों की स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्ति खतरे में है।
संकाय सदस्यों ने मांग की है कि शैक्षणिक स्वतंत्रता से संबंधित मामलों में सभी निर्णयों पर तब तक रोक लगाई जानी चाहिए, जब तक कि शैक्षणिक स्वतंत्रता के लिए समिति का गठन नहीं हो जाता।
अशोक विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर सब्यसाची दास के इस्तीफा देने के कुछ दिन बाद अर्थशास्त्र विभाग के एक अन्य प्रोफेसर पुलाप्रे बालाकृष्णन ने भी अपना इस्तीफा दे दिया था।
दास ने अपने शोध पत्र पर हुए विवाद के बाद इस्तीफा दे दिया था।
विश्वविद्यालय ने पहले शोध पत्र, ‘‘डेमोक्रेटिक बैकस्लाइडिंग इन द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी’’ से दूरी बना ली थी। शोध पत्र में दास ने तर्क दिया था कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2019 के लोकसभा चुनावों में करीबी मुकाबले वाली संसदीय सीटों पर असंगत तरीके से मत हासिल किये थे, खासकर उन राज्यों में जहां वह उस समय सत्तारूढ़ पार्टी थी।
आर्थिक विभाग के संकाय सदस्यों ने अब एक खुला पत्र लिखा था, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि दास के शोध पत्र के गुण-दोषों की जांच की प्रक्रिया में शासी मंडल का हस्तक्षेप हुआ तो संकाय सदस्यों का विश्वविद्यालय छोड़ना शुरू हो जाएगा।
अंग्रेजी और रचनात्मक लेखन विभाग ने भी एक संयुक्त बयान में दास को बहाल करने की मांग की थी।
लगभग 100 संकाय सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित संयुक्त पत्र में कहा गया है, ‘‘भारत में विश्वविद्यालयों के भीतर विचारों की स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्ति आज संकट में है, जिसका मुख्य कारण आलोचना के प्रति लगभग पूर्ण असहिष्णुता है। आलोचना क्या है! यह वैध असहमति है, और इसमें उन सवालों को उठाना शामिल है, जो किसी भी बिंदु पर, एक स्वतंत्र और बेहतर समाज के ताने-बाने से जुड़े हुए हैं।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘आलोचना को दबाना शिक्षाशास्त्र के जीवन-रक्त में जहर घोलना है। इसके कारण यह गंभीर विचारकों के रूप में हमारे छात्रों के भविष्य को नुकसान पहुंचाएगा। प्रो. सब्यसाची दास द्वारा प्रकाशित एक शोध पत्र को लेकर हाल की घटनाएं इस बात की याद दिलाती हैं कि संकट बड़ा है, जिसका अशोक विश्वविद्यालय और उस मामले में, भारत में काम करने वाले हर शैक्षणिक पर प्रभाव पड़ता है।’’
पत्र में कहा गया है, ‘‘माफी और इस्तीफों से इसका हल नहीं निकलेगा। इसका समाधान अकादमिक स्वतंत्रता के साथ किया जाना चाहिए। अशोक विश्वविद्यालय ने 2021 में शैक्षणिक स्वतंत्रता के लिए एक दस्तावेज का मसौदा तैयार किया और अपनाया।’’
दास के शोध पत्र की आलोचना होने के बाद, विश्वविद्यालय ने खुद को इससे अलग कर लिया था और कहा था कि संकाय, छात्रों या कर्मचारियों द्वारा उनकी ‘‘व्यक्तिगत स्तर’’ पर कोई भी सोशल मीडिया गतिविधि या सार्वजनिक सक्रियता उसके रुख को प्रतिबिंबित नहीं करती है।
दास ने बाद में इस्तीफा दे दिया था और विश्वविद्यालय ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया था।
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