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नेपाल में तबाही के बीच फरक्का बैराज फिर क्यों है चर्चा में

नेपाल और तिब्बत में बाढ़ से हुई तबाही के बाद बिहार भी सहम सा गया है.

नेपाल में तबाही के बीच फरक्का बैराज फिर क्यों है चर्चा में
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

नेपाल और तिब्बत में बाढ़ से हुई तबाही के बाद बिहार भी सहम सा गया है. बिहार सरकार ने पश्चिम बंगाल से फरक्का बैराज के सभी गेट खोलने की मांग की है.बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने नेपाल के जल अधिग्रहण क्षेत्र में लगातार हो रही बारिश से कई जिलों में गंगा नदी में जलस्तर में वृद्धि को देखते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से फरक्का बैराज के सभी गेट खोलने की मांग की है. 23 अगस्त को हुई इस बातचीत के 24 घंटे के अंदर बैराज के सभी फाटक खोल दिए गए, जिससे बिहार में नदियों का जलस्तर तेजी से कम हुआ. अब बिहार इस समझौते के नवीकरण की जगह नया समझौता चाहता है, जिसमें बिहार के बाढ़ प्रबंधन और अन्य मुद्दों को प्राथमिकता दी जाए.

फरक्का बैराज का निर्माण 1975 में मुख्य रूप से कोलकाता बंदरगाह और भागीरथी-हुगली जलमार्ग में नौ परिवहन के लिए गहराई बनाए रखने के उद्देश्य से किया गया था. सोच यह थी कि हुगली नदी में पर्याप्त पानी पहुंचा कर कोलकाता बंदरगाह में गाद (सिल्ट) कम किया जाए. कालांतर में यह परियोजना बिहार, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच जल प्रबंधन का महत्वपूर्ण केंद्र बन गई.

बिहार में बाढ़ की वजह बना फरक्का बैराज

भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को 30 साल के लिए यह जल संधि की गई थी, जिसे फरक्का बैराज संधि कहा जाता है. इसका उद्देश्य दोनों देश के बीच पानी का बंटवारा करना था. पानी की उपलब्धता के अनुसार दोनों के हिस्से तय होते हैं. यह बैराज बंगाल में गंगा नदी पर बनाया गया है, लेकिन इसके कारण गंगा नदी के प्रवाह की गति पीछे की तरफ धीमी हो जाती है. इसके परिणामस्वरूप नदी अपने साथ जो गाद लाती है, वह बैराज के पीछे बिहार में गंगा नदी की तलहटी में जमा हो जाती है.

बैराज के कारण गंगा व उसकी सहायक नदियांइस सिल्ट के कारण उथली होती जा रही हैं. मानसून में जब पानी बढ़ता है तो यही उथलापन, बाढ़ का कारण बन जाता है. इससे बिहार को दो तरफा नुकसान हो रहा है. शुष्क मौसम में पानी की कमी तथा मानसून में बाढ़. बिहार का कहना है कि इस बराज को या तो पूरी तरह हटा दिया जाए या फिर ऐसी व्यवस्था की जाए, जिससे गाद का बहाव सुचारू रूप से हो सके. ताकि, बिहार को बाढ़ की समस्या न झेलनी पड़े.

गंडक का जलस्तर तीन मीटर तक हो सकता है ऊंचा

इस बीच, बिहार सरकार ने नेपाल में फ्लैश फ्लड की आपदा और गंडक नदी में अचानक जल प्रवाह तेज होने की संभावना को देखते हुए बांधों तथा तटबंधों की 24 घंटे निगरानी का आदेश दिया है. सीमावर्ती छह जिलों पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है. नेपाल की त्रिशूली नदी का भारी सैलाब गंडक की ओर बढ़ रहा है. इससे नारायणी नदी में भी पानी बढ़ गया है. यही नारायणी नदी बिहार में गंडक नदी कहलाती है.

गंडक नदी के जलस्तर में एक से तीन मीटर तक की भारी वृद्धि की आशंका है. जल संसाधन विभाग के अनुसार बुधवार की रात आठ बजे के बाद फ्लैश फ्लड का पानी आना शुरू हुआ और 12 बजे तक जल प्रवाह डेढ़ लाख क्यूसेक तक पहुंच गया. राहत की बात हालांकि यह रही कि 12.30 बजे यह घटकर 1.42 लाख और एक बजे 1.29 लाख तथा दो 1.04 लाख क्यूसेक रह गया. सुरक्षा के लिहाज से पश्चिम चंपारण जिला स्थित वाल्मीकिनगर बैराज के सभी 36 फाटक खोल दिए गए हैं.

बिहार के बड़े क्षेत्र में पानी के फैलाव की आशंका

नेपाल से आने वाली ज्यादातर नदियों का बहाव बिहार की ओर ही है. वहीं बिहार में नदियां पहले से ही गाद से भरी हैं, इसलिए इस बार बड़ी आबादी को बाढ़ की विभीषिका झेलनी पड़ सकती है. गंगा मुक्ति आंदोलन के संस्थापक ए प्रकाश का कहना है कि हर साल मानसून में नेपाल में होने वाली बारिश का खामियाजा बिहार के 20 जिलों को भुगतना पड़ता है. लेकिन, इसे रोका नहीं जा सकता है, बल्कि इसका प्रभाव कम किया जा सकता है.

नदी विशेषज्ञ दिनेश मिश्र कहते हैं, ‘‘नदियों को रोकने की कवायद बेकार है. उन्हें अपनी रौ में बहने देना चाहिए. हमें बांध बनाकर या तटबंधों को ऊंचा कर उन्हें रोकना चाहते हैं. इससे बाढ़ की समस्या का समाधान नहीं होगा. नदी की तलहटी में गाद जमा हो रही है. जब तक गाद प्रबंधन नहीं होगा तब तक समस्या ज्यों की त्यों ही रहेगी.''

फरक्का पर तेज हुई राजनीति

भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल के बंटवारे को लेकर 30 साल पुराने इस समझौते की अवधि दिसंबर, 2026 में समाप्त हो रही है. अब इसके नवीनीकरण के समय बिहार की सियासत भी गर्म हो गई है. इसे लेकर जेडीयू और आरजेडी, दोनों ने एक दूसरे पर निशाना साधा है. जेडीयू सांसद संजय झा का कहना है कि 1996 में जब केंद्र की संयुक्त मोर्चा सरकार ने बांग्लादेश के साथ यह समझौता किया था, तब लालू प्रसाद यादव केंद्र में काफी प्रभावशाली नेता थे. अगर, उस समय बिहार सरकार ने इस जलसंधि का मजबूती से विरोध किया होता तो राज्य को बीते तीन दशकों से बाढ़ और फिर सूखे की दोहरी मार नहीं झेलनी पड़ती.

इस पर पलटवार करते हुए आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद ने सोशल मीडिया में एक बयान जारी कर नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए कहा कि नीतीश ने अपने राजनीतिक जीवन में दूरगामी प्रभाव वाले मुद्दों पर कभी ध्यान नहीं दिया. फरक्का के मुद्दे पर उन्होंने हमेशा चुप्पी साधे रखी. लालू ने संसद में अपने एक पुराने भाषण का वीडियो साझा करते हुए बताया कि उन्होंने इस संधि को देशहित के खिलाफ बताते हुए कैसे इसे रद्द करने की मांग की थी. क्योंकि इसमें बिहार के भविष्य के खतरे को अनदेखा किया गया था.

(The above story first appeared on LatestLY on Aug 28, 2026 07:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).