जरुरी जानकारी | बेतहाशा सस्ते खाद्य तेलों के आयात से सभी तेल-तिलहनों में गिरावट
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नयी दिल्ली, 13 जुलाई बेतहाशा सस्ते तेलों के आयात की स्थिति के बीच बृहस्पतिवार को दिल्ली तेल-तिलहन बाजार में लगभग सभी तेल-तिलहनों के दाम नीचे आए।
मलेशिया एक्सचेंज में लगभग 1.5 प्रतिशत की गिरावट चल रही है जबकि शिकॉगो एक्सचेंज में सुधार दिख रहा है।
सूत्रों ने बताया कि देश में जिस कदर सस्ते सूरजमुखी तेल के आयात से बाजार अटा पड़ा है, ऐसे में देशी सूरजमुखी, सोयाबीन और सरसों तो खपेगा नहीं लेकिन कटाई के समय बरसात के कारण जो सरसों नमीग्रस्त हुई हैं, स्टॉक में रखे जाने के बाद उनके खराब होने का खतरा है। बेशक सोयाबीन खराब नहीं होगा पर हरियाणा, पंजाब में स्टॉक किए गए सूरजमुखी के चूहों के कुतर जाने की आशंका है क्योंकि यह काफी मीठा होता है।
सूत्रों ने कहा कि हमारे यहां देशी तेल-तिलहनों का बाजार बनाने की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया और केवल यह हौव्वा खड़ा किया गया कि खाद्य तेलों के दाम बढ़ने से महंगाई बढ़ती है। जबकि सभी को मालूम है कि प्रति व्यक्ति खाद्य तेल की खपत काफी अल्प मात्रा में होती है। जबकि तिलहन व्यवसाय से कपड़ा उद्योग, दूध उद्योग गहरा जुड़ाव रखता है। तिलहन की पैदावार घटने से खल महंगे हो जाते हैं और नतीजतन दूध के दाम बढ़ते हैं। तिलहन के दाम में मामूली वृद्धि की जाती तो किसान इसका उत्पादन बढ़ा देते और आयात पर खर्च होने वाले भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत होती और दूध के दाम पर भी लगाम रहती। तिलहन किसानों के पास पैसा जाने से उनकी क्रय शक्ति बढ़ती और यह पैसा फिर से देश की अर्थव्यवस्था में ही खपता।
सूत्रों ने कहा कि वर्ष 2006-07 के लगभग देश करीब 20,000 करोड़ रुपये खाद्य तेलों के आयात के लिए खर्च करता था जो अब बढ़कर लगभग 1,57,000 करोड़ रुपये हो गया है।
उन्होंने कहा कि अगले 4-5 साल यही हाल रहा तो देश का तेल-तिलहन उद्योग बहुत बुरी हालत में हो सकता है और किसान तिलहन बुवाई से परहेज कर सकते हैं। इस खरीफ बुवाई के समय भी 12 जुलाई की स्थिति के अनुसार, आंध्र प्रदेश में कपास की खेती के रकबे में पिछले साल के 2.4 लाख हेक्टेयर के मुकाबले बुवाई का रकबा घटकर इस बार मात्र 98,000 हेक्टेयर रह गया है।
उल्लेखनीय है कि पशु आहार वाले खल की प्राप्ति सबसे अधिक कपास से निकलने वाले बिनौले से ही प्राप्त होती है।
सूत्रों ने कहा कि तेल संगठनों की ओर से पहले हर महीने खल निर्यात के आंकड़े दिये जाते थे लेकिन लगभग पिछले पांच महीने से कोई इन आंकड़ों को सामने नहीं ला रहा है जिससे पता चले कि देशी तेल-तिलहन की बाजार में खपत की क्या स्थिति है। सूत्रों ने कहा कि सभी ने मौन साध रखा है और देशी तेल-तिलहन कारोबार की स्थिति पर बोलने से बच रहे हैं।
बृहस्पतिवार को तेल-तिलहनों के भाव इस प्रकार रहे:
सरसों तिलहन - 5,375-5,425 (42 प्रतिशत कंडीशन का भाव) रुपये प्रति क्विंटल।
मूंगफली - 6,975-7,025 रुपये प्रति क्विंटल।
मूंगफली तेल मिल डिलिवरी (गुजरात) - 17,150 रुपये प्रति क्विंटल।
मूंगफली रिफाइंड तेल 2,480-2,755 रुपये प्रति टिन।
सरसों तेल दादरी- 10,400 रुपये प्रति क्विंटल।
सरसों पक्की घानी- 1,735 -1,815 रुपये प्रति टिन।
सरसों कच्ची घानी- 1,735 -1,845 रुपये प्रति टिन।
तिल तेल मिल डिलिवरी - 18,900-21,000 रुपये प्रति क्विंटल।
सोयाबीन तेल मिल डिलिवरी दिल्ली- 10,150 रुपये प्रति क्विंटल।
सोयाबीन मिल डिलिवरी इंदौर- 10,000 रुपये प्रति क्विंटल।
सोयाबीन तेल डीगम, कांडला- 8,350 रुपये प्रति क्विंटल।
सीपीओ एक्स-कांडला- 8,100 रुपये प्रति क्विंटल।
बिनौला मिल डिलिवरी (हरियाणा)- 9,100 रुपये प्रति क्विंटल।
पामोलिन आरबीडी, दिल्ली- 9,500 रुपये प्रति क्विंटल।
पामोलिन एक्स- कांडला- 8,500 रुपये (बिना जीएसटी के) प्रति क्विंटल।
सोयाबीन दाना - 5,020-5,115 रुपये प्रति क्विंटल।
सोयाबीन लूज- 4,785-4,880 रुपये प्रति क्विंटल।
मक्का खल (सरिस्का)- 4,015 रुपये प्रति क्विंटल।
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