विदेश की खबरें | फर्जी खबरों का पता लगाने और इसके प्रसार को रोकने में ‘एल्गोरिदम’ हो सकता है उपयोगी

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on world at LatestLY हिन्दी. वेंकुवर (कनाडा), 11 जून (द कन्वरसेशन) फर्जी खबर एक जटिल समस्या है तथा इसके दायरे में शब्द, तस्वीरें और वीडियो हो सकते हैं।

श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

वेंकुवर (कनाडा), 11 जून (द कन्वरसेशन) फर्जी खबर एक जटिल समस्या है तथा इसके दायरे में शब्द, तस्वीरें और वीडियो हो सकते हैं।

फर्जी खबर गढ़ने के कई तरीके हो सकते हैं, जिसके जरिये लोगों के नाम, तारीख या आंकड़ों सहित चुनिंदा तथ्यों में बदलाव कर एक फर्जी खबर गढ़ी जा सकती है।

एक खबर को पूरी तरह से बनावटी घटनाओं या किरदारों के साथ भी गढ़ा जा सकता है।

तकनीक से भी फर्जी खबर गढ़ी जा सकती है क्योंकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता में प्रगति से गलत सूचना उत्पन्न करना विशेष रूप से आसान हो जाता है।

नुकसानदेह प्रभाव:

‘‘क्या 2020 के अमेरिकी चुनावों में धांधली हुई थी?’’ या ‘‘क्या जलवायु परिवर्तन एक धोखा है?’’, इस तरह के प्रश्नों में तथ्यों की जांच उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण कर की जा सकती है। साथ ही, इन सवालों का सही या गलत जवाब दिया जा सकता है, लेकिन इस तरह के सवालों को लेकर गलत सूचनाएं फैलने की संभावना रहती है।

गलत सूचना या फर्जी खबर की अल्पावधि में बड़ी आबादी पर नुकसानदेह प्रभाव देखने को मिल सकता है। तकनीकी प्रगति से पहले भी फर्जी खबरों की धारणा मौजूद थी, लेकिन सोशल मीडिया ने इस समस्या को बढ़ा दिया है।

वर्ष 2018 में किए गए ट्विटर के एक अध्ययन से पता चला है कि झूठी खबरों को ‘बॉट’ की तुलना में मनुष्यों द्वारा अधिक रीट्वीट किया जाता है, जबकि सच्ची कहानियों की तुलना में फर्जी खबरों को 70 प्रतिशत अधिक रीट्वीट किए जाने की संभावना होती है।

इसी अध्ययन में पाया गया कि जहां सही खबरें 1,000 से अधिक लोगों तक ही पहुच सकीं, वहीं फर्जी खबरों के 1,00,000 लोगों तक फैलने की संभावना रही।

वर्ष 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव, कोविड-19 के टीके और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी फर्जी सूचनाओं के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

यह अनुमान लगाया गया है कि कोविड-19 के बारे में गलत जानकारी फैलने के चलते प्रतिदिन पांच से 30 लाख अमरीकी डॉलर के बीच नुकसान हुआ, जबकि राजनीतिक रूप से संवेदनशील भ्रामक सूचनाओं के प्रसार की कीमत सार्वजनिक अव्यवस्था, हिंसा या लोकतांत्रिक संस्थानों से जनता का भरोसा टूटने के तौर पर चुकानी पड़ सकती है।

भ्रामक सूचनाओं का पता लगाना:

एल्गोरिदम, ‘मशीन-लर्निंग मॉडल’ और मानवीय हस्तक्षेप के जरिये गलत सूचनाओं का पता लगाया जा सकता है। एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि एक बार पता चलने पर गलत सूचना के प्रसार को रोकने के लिए कौन जिम्मेदार है।

वास्तव में केवल सोशल मीडिया कंपनियां अपने नेटवर्क के माध्यम से सूचना के प्रसार पर नियंत्रण रखने की स्थिति में हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, खासतौर पर चैटजीपीटी से लैस हालिया तकनीकी प्रगति ने अत्यधिक तेज गति से और भारी मात्रा में आलेख तैयार करना आसान कर दिया है। इससे गलत सूचना का पता लगा पाने और उसके प्रसार को वास्तविक समय पर रोक पाने की चुनौती बढ़ रही है। हमारा मौजूदा शोध इस चुनौती का समाधान करना जारी रखेगा, जिसका व्यापक सामाजिक प्रभाव है।

(द कन्वरसेशन)

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