एआई बताएगा सेहत से जुड़े जोखिम, नींद के पैटर्न से होगी जांच
एक नया एआई मॉडल 'स्लीप एफएम' नींद को जांच कर बीमारियों के जोखिम का पता लगा सकता है.
एक नया एआई मॉडल 'स्लीप एफएम' नींद को जांच कर बीमारियों के जोखिम का पता लगा सकता है. नींद के पैटर्न से अनुमान लगाया जा सकेगा कि किसी व्यक्ति को भविष्य में डिमेंशिया और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा है या नहीं.अब शारीरिक बीमारियां पता लगाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं, बस लैब में एक रात सोना ही काफी है. इस दौरान शारीरिक संकेत रिकॉर्ड किए जाते हैं. एक नया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल इन संकेतों को जांच कर अनुमान लगा सकता है कि किसी व्यक्ति को आगे चलकर लगभग 130 तरह की बीमारियां होने का कितना खतरा है. इस जांच के जरिए पार्किंसन रोग, डिमेंशिया, दिल की बीमारियां और प्रोस्टेट व स्तन कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के जोखिम का भी पता लगाया जा सकता है.
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में बायोमेडिकल डेटा साइंस के प्रोफेसर और 'द स्लीप एफएम स्टडी' के सह-वरिष्ठ लेखक जेम्स जो के अनुसार, स्लीप एफएम बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई देने से कई साल पहले ही इन जोखिमों का अनुमान लगा सकता है. यह अध्ययन प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर मेडिसिन' में प्रकाशित हुआ है.
'स्लीप एफएम' में लगभग छह लाख घंटे की नींद से जुड़ा डेटा दिया गया. यह करीब 65,000 लोगों की नींद को रिकॉर्ड करके इकट्ठा किया गया था. नींद को रिकॉर्ड करने और उसका वैज्ञानिक अध्ययन करने की इस प्रक्रिया को 'पॉलीसोमनोग्राफी' कहा जाता है. इसमें अलग-अलग तरह के सेंसर लगाए जाते हैं, जो सोते समय व्यक्ति के दिमाग की तरंगों (ब्रेन वेव्स), दिल की गतिविधि, सांस लेने की प्रक्रिया, मांसपेशियों का तनाव और आंखों व पैरों की हरकतों को मापते हैं.
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'स्लीप एफएम' के लिए शोध टीम ने ज्यादातर स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के स्लीप मेडिसिन सेंटर से इकट्ठा किया गया डेटा इस्तेमाल किया. यह विश्वविद्यालय अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य में है.
नींद के डेटा से प्रशिक्षित एआई
सबसे पहले 'स्लीप एफएम' को सामान्य नींद के दौरान दिमाग, दिल और शरीर से आने वाले संकेत दिए गए. इन संकेतों के आधार पर सांख्यिकीय तरीके से यह तय किया गया कि "सामान्य" नींद कैसी होती है.
इसके बाद 'स्लीप एफएम' को नींद के अलग-अलग चरणों और 'स्लीप एपनिया' के बारे में सिखाया गया. यह ऐसी समस्या है, जिसमें सोते समय सांस बार-बार रुकती और फिर शुरू होती है. इसके बाद शोधकर्ताओं ने नींद संबंधित डेटा को पिछले 25 सालों के इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड्स से जोड़ा. फिर उन्होंने यह जांचा कि समय के साथ सामने आने वाली बीमारियों का संबंध पॉलीसोमनोग्राफी से मिले इन मापों से कैसे जुड़ा है.
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इस तरह 'स्लीप एफएम' ने डेटा में छिपे पैटर्न पहचानने शुरू किए. इसके जरिए एआई लगभग 1,000 संभावित बीमारियों में से 130 बीमारियों की पहचान करता है. नींद के डेटा के आधार पर मध्यम से लेकर उच्च स्तर की सटीकता के साथ अनुमान लगाया जा सकता है.
इस अध्ययन के सह-प्रमुख लेखक और बायोमेडिकल डेटा साइंस के पीएचडी छात्र राहुल थापा ने बताया, "हमारे नतीजे दिखाते हैं कि स्ट्रोक, डिमेंशिया, हार्ट फेल और किसी भी कारण से होने वाली मृत्यु का जोखिम नींद के डेटा के आधार पर पता लगाया जा सकता है. इससे फिर एक बार यह बात साफ हो जाती है कि लंबी सेहतमंद जिंदगी के लिए नींद एक बेहद शक्तिशाली जैविक संकेत है."
जर्मनी के डॉर्टमुंड स्थित टेक्निकल यूनिवर्सिटी में मशीन लर्निंग के विशेषज्ञ और जर्मनी में नींद से जुड़े एक प्रोजेक्ट 'स्लीपवॉकर' पर काम कर रहे सेबास्टियन बुशयैगर के अनुसार, "सैद्धांतिक रूप से, अगर बुनियादी डेटा उपलब्ध हो तो किसी एआई मॉडल को बहुत बड़ी संख्या में संभावित चीजों का अनुमान लगाने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है." सेबास्टियन, अमेरिका में हुए प्रोजेक्ट 'स्लीप एफएम' का हिस्सा नहीं थे.
उन्नत एल्गोरिदम के जरिए किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि नींद के दौरान दिल से मिलने वाले संकेत हृदय संबंधी बीमारियों का अनुमान लगाने में मदद कर सकते हैं. वहीं, दिमाग से मिलने वाले संकेत भविष्य में होने वाले न्यूरोलॉजिकल और मानसिक विकारों के बारे में जानकारी दे सकते हैं.
हालांकि, सबसे सटीक और उपयोगी नतीजे तब मिलते हैं, जब शरीर से मिलने वाले अलग-अलग संकेतों को एक साथ देखा जाता है. जैसे, कभी-कभी ऐसा होता है कि दिमाग की इलेक्ट्रिकल गतिविधि बताती है व्यक्ति गहरी और स्थिर नींद में है, लेकिन जब दिल के संकेत देखे जाते हैं तो पता चलता है कि शरीर अब भी कुछ हद तक "जागी हुई" अवस्था में है.
ऐसे विरोधाभासी संकेत भविष्य में होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं की ओर इशारा कर सकते हैं. दिमाग और दिल से मिलने वाले संकेतों के बीच मेल न होना, इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर के भीतर किसी शुरुआती बीमारी के कारण छिपा हुआ शारीरिक तनाव मौजूद है.
अलग-अलग क्षेत्रों से सहयोग बेहद जरूरी
सेबास्टियन बुशयैगर बताते हैं, "अगर स्लीप मेडिसिन में काम करने वाले हमारे साथियों को किसी तरह के आपसी संबंध का शक होता है, तो हम एआई विशेषज्ञ उस जानकारी को एक भविष्यवाणी करने वाली प्रणाली में शामिल कर सकते हैं. इसके अलावा हम ऐसे संकेत भी दे सकते हैं कि ऐसे संबंध कहां हो सकते हैं."
उनका कहना है कि एआई केवल सांख्यिकीय संबंध दिखा सकता है. इन संबंधों का असली मतलब क्या है, उनके पीछे छिपे कारण और उसका परिणाम क्या है, यह समझना और तय करना अब भी मेडिकल क्षेत्र के प्रशिक्षित विशेषज्ञों की ही जिम्मेदारी है.
'स्लीप एफएम' के अनुमान ज्यादातर स्लीप लैब्स से मिले डेटा पर आधारित हैं. इसका मतलब है कि यह डेटा उन लोगों से आया है, जिन्हें आमतौर पर नींद की समस्या के कारण डॉक्टरों के पास भेजा गया था. ये लोग समृद्ध इलाकों में रहते हैं और उन जगहों में उन्नत मेडिकल तकनीक उपलब्ध है.
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'स्लीप एफएम' के शोधकर्ताओं ने अमेरिका और यूरोप के लोगों की नींद से जुड़े डेटा को भी शामिल किया है. फिर भी जिन लोगों को नींद की कोई समस्या नहीं है और जो दुनिया के कम समृद्ध इलाकों में रहते हैं, वह पर्याप्त तौर पर इस मॉडल का हिस्सा नहीं बने हैं.
'स्लीप एफएम' के शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नहीं बता सकता कि किसी बीमारी की असली वजह क्या है. यह केवल उनका आपसी संबंध दिखाता है. यानी, ऐसे पैटर्न पहचानता है जिनका बाद में सामने आने वाली बीमारियों से संबंध हो सकता है.
डॉर्टमुंड की टेक्निकल यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर वैज्ञानिक और जर्मनी में 'स्लीपवॉकर प्रोजेक्ट' के लिए नींद के डेटा का विश्लेषण कर रहे माथियस याकॉब्स बताते हैं कि ज्यादातर एआई सिस्टम यह नहीं समझ पाते कि किसी चीज की वजह क्या है. यानी, वे केवल पैटर्न बता सकते हैं, बीमारी का असल कारण नहीं.
मेडिकल साइंस के लिए खुल रहे हैं नए रास्ते
एआई, मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करता है. यह ऐसी प्रोग्रामिंग होती है, जिसमें कंप्यूटर विशाल मात्रा में मौजूद डेटा से अपने आप पैटर्न ढूंढना सीखता है. इसका मतलब है कि मशीनें डेटा में मिलने वाले पैटर्न से "सीखती" हैं.
माथियस ने डीडब्ल्यू को ई-मेल पर दिए गए इंटरव्यू में लिखा कि भले ही कंप्यूटर केवल सांख्यिकीय संबंध ही क्यों न खोजता हो, फिर भी इसका इस्तेमाल बीमारियों की पहचान और मेडिकल इलाज में किया जा सकता है. उनके अनुसार, 'स्लीप एफएम' जैसे मॉडल नींद के अलग-अलग चरणों या 'स्लीप एपनिया' जैसी समस्याओं को तेज और प्रभावी ढंग से रिकॉर्ड कर सकते हैं. इससे डॉक्टरों को तकनीकी काम में कम समय लगाना पड़ता है और वे मरीजों के साथ ज्यादा समय बिता पाते हैं.
वहीं, सेबास्टियन बुशयैगर अलग-अलग क्षेत्रों के सहयोग की अहमियत पर जोर देते हैं. उनका कहना है, "एआई मॉडल को इलाज की योजना बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है. मगर, नतीजों को समझना और बीमारी के सभी मूल कारण जाने बिना भी सही इलाज चुनना इंसानों यानी डॉक्टरों का काम होता है."
इस तरह की नींद आधारित जांच सिर्फ पॉलीसोमनोग्राफी और बीमारी के बीच मौजूदा सह-संबंध पता लगाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह उससे कहीं आगे तक जाने की संभावना भी रखता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर नींद से जुड़े कुछ खास संकेत बार-बार किसी विशेष बीमारी से जुड़े पाए जाते हैं, तो इससे पता चल सकता है कि नर्वस सिस्टम, दिल और रक्त संचार प्रणाली और इम्यून सिस्टम की कौन-सी प्रक्रिया शुरुआत से प्रभावित होने लगती है. भविष्य में इस तरह की जानकारी का इस्तेमाल सिर्फ स्लीप लैब्स तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह समाज को अधिक सेहतमंद बनाने में मदद कर सकता है.